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रोहिणी आयोग और सब-क्लासिफिकेशन: क्या OBC आरक्षण का न्यायसंगत वितरण संभव है?

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
6 Min Read

नई दिल्ली।

भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए निर्धारित 27% आरक्षण व्यवस्था लंबे समय से नीतिगत और सामाजिक चर्चाओं का केंद्र रही है। रोहिणी आयोग (Justice Rohini Commission) का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि 27% आरक्षण के लाभ का न्यायसंगत वितरण (Equitable Distribution) पक्का किया जा सके। केंद्रीय OBC सूची में शामिल हज़ारों जातियों के बीच मौजूद असमानता को दूर करने के लिए सब-क्लासिफिकेशन (उप-वर्गीकरण) की मांग लगातार उठती रही है।

 

OBC श्रेणी के भीतर असमानता की स्थिति

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OBC श्रेणी को अक्सर एक समान सामाजिक समूह के रूप में देखा जाता है, जबकि हज़ारों कम्युनिटीज़ का इतिहास, आबादी का आकार, शैक्षणिक स्तर और सार्वजनिक रोज़गार तक पहुँच काफी भिन्न है।

रोहिणी आयोग द्वारा केंद्रीय नौकरियों (लगभग 1.3 लाख पद) और केंद्रीय उच्च शैक्षणिक संस्थानों (IIT, IIM, AIIMS, NIT आदि) के आंकड़ों के विश्लेषण से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:

  • कंसंट्रेशन (लाभ का संकेंद्रीकरण): जांचे गए कुल अवसरों का 97% लाभ केवल 25% OBC समुदायों तक सीमित पाया गया।
  • प्रमुख 10 जातियाँ: कुल अवसरों का लगभग 24.95% हिस्सा मात्र 10 जातियों के पास था।
  • शून्य प्रतिनिधित्व: केंद्रीय सूची में शामिल 983 OBC समुदायों (लगभग 37%) का प्रतिनिधित्व शून्य दर्ज किया गया।
  • अल्प प्रतिनिधित्व: अन्य 994 समुदायों की हिस्सेदारी कुल लाभों में मात्र 2.68% रही।

 

डेटा की कमी और जनगणना की चुनौतियाँ

उप-वर्गीकरण के सामने सबसे बड़ी बाधा आनुपातिक आबादी (Proportional Population) के सटीक आंकड़ों का न होना है:

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  1. जाति जनगणना का अभाव: राष्ट्रीय स्तर पर जातियों के सटीक आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण यह तय करना कठिन होता है कि लाभ आबादी के अनुपात में है या नहीं।
  2. SECC 2011 के मुद्दे: 2011 के सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) में वर्तनी, उप-नामों और क्षेत्रीय पहचान से जुड़ी कई तकनीकी विसंगतियाँ (Data Quality Issues) पाई गईं, जिसके कारण इसका जातिगत विवरण सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया जा सका।

 

राज्य स्तरीय मॉडल और कानूनी मिसालें

कई राज्यों ने केंद्रीय स्तर से पहले ही आंतरिक उप-वर्गीकरण के मॉडल अपनाए हैं:

  • बिहार का जाति सर्वे (2023): बिहार में अत्यन्त पिछड़ा वर्ग (EBC – 36.01%) और पिछड़ा वर्ग (BC – 27.13%) का पृथक वर्गीकरण यह दर्शाता है कि एक ही व्यापक समूह के भीतर प्रतिस्पर्धा असमान हो सकती है।
  • इंद्रा साहनी मामला (1992): सर्वोच्च न्यायालय की 9-न्यायाधीशों की पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि पिछड़ा वर्ग को ‘पिछड़ा’ और ‘अधिक पिछड़ा’ श्रेणियों में विभाजित करने पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है।
  • दविन्द सिंह मामला (2024): 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 7-जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया कि पर्याप्त और समकालीन आंकड़ों के आधार पर राज्य आरक्षण के लाभों के वितरण हेतु उप-वर्गीकरण कर सकते हैं।
  • तमिलनाडु (वन्नियार मामला 2022): सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में वन्नियार समुदाय के लिए 10.5% आंतरिक आरक्षण के कानून को इसलिए रद्द कर दिया था क्योंकि राज्य के पास पर्याप्त और समकालीन आंकड़े (Quantifiable Data) उपलब्ध नहीं थे।

 

रोहिणी आयोग की रिपोर्ट की वर्तमान स्थिति

न्यायमूर्ति जी. रोहिणी की अध्यक्षता वाले आयोग ने 31 जुलाई 2023 को अपनी अंतिम रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी है। सरकार द्वारा रिपोर्ट की प्राप्ति की पुष्टि की जा चुकी है, लेकिन पूरी रिपोर्ट अभी सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई है।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: रोहिणी आयोग का गठन कब और क्यों किया गया था?उत्तर: रोहिणी आयोग का गठन 2 अक्टूबर 2017 को पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी की अध्यक्षता में केंद्रीय OBC सूची के भीतर आरक्षण के फायदों के समान वितरण और सब-क्लासिफिकेशन के मानदंड तय करने के लिए किया गया था।

Q2: आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट कब सौंपी?उत्तर: आयोग ने कई विस्तार मिलने के बाद 31 जुलाई 2023 को अपनी अंतिम रिपोर्ट भारत के राष्ट्रपति को सौंपी।

Q3: क्या सुप्रीम कोर्ट उप–वर्गीकरण की अनुमति देता है?उत्तर: हाँ, 1992 के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी मामले में 9-जजों की पीठ ने स्पष्ट किया था कि पिछड़ा वर्ग को ‘पिछड़ा’ और ‘अधिक पिछड़ा’ में विभाजित करना संवैधानिक रूप से वैध है, बशर्ते इसके लिए पर्याप्त आंकड़े मौजूद हों।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख उपलब्ध ऐतिहासिक आंकड़ों, अदालती निर्णयों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रोहिणी आयोग के प्राथमिक विश्लेषण पर आधारित एक विश्लेषणात्मक विवरण है। जब तक आयोग की अंतिम रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर पूर्ण रूप से प्रकाशित नहीं होती, तब तक प्रस्तावित कोटे और सिफारिशों के अंतिम स्वरूप की पुष्टि नहीं की जा सकती।

 

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।