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कॉलोनियल शासन और ‘जाति की पहचान’: 1901 की जनगणना जिसने भारत का सामाजिक ढांचा बदल दिया

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
7 Min Read

नई दिल्ली|

एक सामान्य जनगणना का मुख्य उद्देश्य आबादी की कुल संख्या, साक्षरता और जनसांख्यिकीय आंकड़ों की गिनती करना होता है। लेकिन क्या होता है जब वही जनगणना देश की आबादी को प्रशासनिक तौर पर रैंक (रैंकिंग) करने लगती है?

ब्रिटिश भारत के इतिहास में 1901 की जनगणना एक ऐसा ही महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। सेंसस कमिश्नर हर्बर्ट रिस्ले (Sir Herbert Hope Risley) के नेतृत्व में हुए इस सर्वेक्षण ने औपनिवेशिक जाति वर्गीकरण के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया। इस जनगणना ने केवल सामाजिक पदानुक्रम का दस्तावेजीकरण नहीं किया, बल्कि एक ऐसा नया प्रशासनिक मैदान तैयार किया जहाँ जातियों ने ऊँचे दर्जे के लिए दावेदारी पेश की।

 

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थ्योरी में बड़ा बदलाव: काम से जुड़ी पहचान से ‘सामाजिक वरीयता’ तक

1899 में हर्बर्ट रिस्ले को 1901 की जनगणना के लिए सेंसस कमिश्नर नियुक्त किया गया। इससे पहले के प्रख्यात एथनोग्राफर्स और जनगणना अधिकारियों — जैसे डेन्ज़िल इबेट्सन (Denzil Ibbetson), विलियम क्रुक, जे. सी. नेसफ़ील्ड और 1891 के सेंसस कमिश्नर जे. एथेलस्टेन बेन्स — ने जाति के व्यवसायिक मॉडल (Functionalist/Occupational Theory) का समर्थन किया था।

पुराना मॉडल (1891 तक)रिस्ले का नया मॉडल (1901)
आधार: श्रम का विभाजन, ऑक्यूपेशनल गिल्ड्स और सोशियो-इकोनॉमिक स्पेशलाइजेशन।आधार: धार्मिक शुद्धता (Ritual Purity), अंतरविवाह (Endogamy) और तय स्टेटस।
दृष्टिकोण: जातियाँ मुख्य रूप से काम और पेशे के आधार पर विकसित हुईं।दृष्टिकोण: पेशे का वर्गीकरण परिवर्तनशील है और यह सामाजिक कठोरता को समझाने में असमर्थ है।

फ़्रेंच इंडोलॉजिस्ट एमिल सेनार्ट (Émile Senart) की 1896 की पुस्तक ‘लेस कास्ट्स डान्स ल’इंडे’ (Les Castes dans l’Inde) से प्रभावित होकर रिस्ले ने सभी प्रांतीय सेंसस सुपरिटेंडेंट को व्यावसायिक वर्गीकरण छोड़ने का निर्देश दिया। इसके स्थान पर 1901 की जनगणना में जातियों को “स्थानीय जनमानस में पहचानी गई सामाजिक प्राथमिकता” (Social Precedence) के अनुसार वर्गीकृत और रैंक करने का आदेश जारी किया गया।

 

सात गुना नस्लीय टाइपोलॉजी और एंथ्रोपोमेट्रिक मापदंड

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जातिगत वर्गीकरण को वैज्ञानिक आधार देने के लिए रिस्ले ने अपने क्षेत्रीय एंथ्रोपोमेट्रिक (शारीरिक माप) डेटासेट को एक अखिल भारतीय नस्लीय वर्गीकरण में बदला। एडवर्ड अल्बर्ट गेट (E. A. Gait) के साथ मिलकर तैयार की गई भारत की जनगणना, 1901 (वॉल्यूम I: द रिपोर्ट) में भारतीय आबादी को सात प्रमुख नस्लीय प्रकारों में वर्गीकृत किया गया।

सामाजिक वरीयता तय करने के 4 प्रशासनिक मापदंड:

स्थानीय स्तर पर रैंकिंग तय करने के लिए जनगणना अधिकारियों ने रूढ़िवादी पंडितों और बड़े भूस्वामियों की सलाह से निम्नलिखित मानक बनाए:

  1. द्विज जातियों का संबंध: क्या “द्विज” (उच्च) जातियाँ उस समूह से पका हुआ भोजन (घी में बना पक्का खाना) या पानी स्वीकार करती हैं?
  2. नाई और पुजारियों की सेवा: क्या उस जाति को साफ़-सुथरे ब्राह्मण पुजारियों और गाँव के नाइयों की सेवा मिलती है या उन्हें अपने अलग पुजारी रखने पड़ते हैं?
  3. मंदिर प्रवेश का अधिकार: क्या उस समूह के लोगों को बड़े हिंदू मंदिरों के प्रांगण में प्रवेश की अनुमति है?पॉल्यूशन रेडियस (छुआछूत का दायरा): क्या किसी समूह की शारीरिक निकटता या परछाई से रस्मी अशुद्धता होती है, जिसके लिए शुद्धिकरण की आवश्यकता हो?

 

जाति सभाओं का गठन और ‘मान्यता की राजनीति’

जब प्रांतीय स्तर पर जातियों की ड्राफ्ट सूचियाँ प्रकाशित की गईं, तो पूरे ब्रिटिश भारत में सामाजिक लामबंदी की लहर दौड़ गई।

जाति सभाओं का उदय: 1,800 से अधिक जातियों को आधिकारिक शाही पदानुक्रम में रैंक करने की कोशिश ने औपनिवेशिक सरकार और भारतीय समाज के रिश्ते को बदल दिया। कम रैंकिंग दिए जाने के विरोध में विभिन्न उप-जातियाँ ‘जाति सभाओं’ (Jati Sabhas) में संगठित होने लगीं।

  • याचिकाओं की बाढ़: प्रांतीय जनगणना कार्यालय संस्कृत ग्रंथों, ऐतिहासिक ज़मीन के दस्तावेज़ों और वंशावलियों से भरी हज़ारों याचिकाओं से पट गए।
  • वर्ण दावों की होड़: अधिकांश जातियों ने खुद को क्षत्रिय, वैश्य या ब्राह्मण वर्ण का हिस्सा साबित करने के लिए औपनिवेशिक राज्य से आधिकारिक पहचान मांगी।
  • सामाजिक नियमों में कठोरता: अपनी दावेदारी को मज़बूत करने के लिए समुदायों ने अपने भीतर विवाह के नियमों को कड़ा कर दिया और ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों (Sanskritization) को अपनाना शुरू किया।

 

निष्कर्ष: एक ‘औपनिवेशिक सोच से मुक्त’ (Decolonial) दृष्टिकोण की आवश्यकता

1901 की जनगणना इस बात का प्रमाण है कि कैसे प्रशासनिक वर्गीकरण और ‘मान्यता की राजनीति’ एक-दूसरे से जुड़ गए। हालांकि, इस इतिहास का अर्थ यह नहीं है कि ‘जाति’ का निर्माण अंग्रेजों ने किया था — क्योंकि सामाजिक पदानुक्रम औपनिवेशिक शासन से पहले भी भारतीय समाज में मौजूद था।

लेकिन, 1901 की जनगणना की रैंकिंग प्रणाली ने पहले से मौजूद तरल और स्थानीय पहचानों को अत्यधिक कठोर, प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया। आज के समय में इस बात पर एक नए ‘डी-कॉलोनियल’ दृष्टिकोण के साथ अध्ययन करने की आवश्यकता है कि कैसे ब्रिटिश जनगणना की नीतियों ने भारत की सामाजिक संरचना पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. 1901 की जनगणना के सेंसस कमिश्नर कौन थे?

उत्तर: 1901 की भारतीय जनगणना के सेंसस कमिश्नर सर हर्बर्ट होप रिस्ले (Herbert Risley) थे।

Q2. 1901 की जनगणना में मुख्य बदलाव क्या था?

उत्तर: इस जनगणना में जातियों को उनके पारंपरिक व्यवसायों के बजाय “स्थानीय सामाजिक वरीयता” (Social Precedence) और रस्मी शुद्धता के आधार पर रैंक करने की शुरुआत की गई।

Q3. 1901 की जनगणना का भारत के सामाजिक ताने–बाने पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: इसके कारण विभिन्न समुदायों ने अपनी रैंकिंग सुधारने के लिए संगठित होकर ‘जाति सभाएं’ बनाईं और ब्रिटिश प्रशासन के पास याचिकाएं भेजीं, जिससे जातिगत पहचानें अधिक कठोर और राजनीतिक बन गईं।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय अध्ययन और उपलब्ध औपनिवेशिक दस्तावेजों (Census of India, 1901 Report) के विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी समुदाय या सामाजिक समूह की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

 

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।