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20 हजार लोगों की मौजूदगी में 179 दिन बाद खुले बद्रीनाथ धाम के कपाट

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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देहरादून. वैदिक मंत्रोच्चार और श्री बद्री विशाल लाल की जय के नारों के साथ रविवार को बद्रीनाथ धाम के कपाट खोले गए। इस दौरान 20 हजार से ज्यादा श्रद्धालु मौजूद थे। इससे पहले ब्रह्ममुहूर्त में मंदिर के बाहर गणेश पूजन हुआ। इसके बाद पुजारियों ने द्वार पूजा की। मंदिर का कपाट तीन चाबियों से खोला गया। कपाट खुलते ही पहले दर्शन अखंड ज्योति के हुए। यह 6 महीने से जल रही है। इसके बाद बद्रीनाथ पर चढ़ा हुआ घी से बना कंबल हटाया गया। जो 6 महीने पहले कपाट बंद होने के समय भगवान को ओढ़ाया जाता है। इस कंबल को प्रसाद रूप में बांटा जाएगा। मंदिर के कपाट पिछले साल 14 नवंबर को बंद हुए थे। यानी 179 दिन बाद बद्रीनाथ के कपाट खोले गए।

6 से 8 बजे तक बिना श्रंगार वाले दर्शन

चारधाम तीर्थ पुरोहित पंचायत के महासचिव डॉ. ब्रजेश सती ने बताया कि सुबह 6 से 8 बजे तक भगवान के बिना श्रंगार के दर्शन किए गए। जिसे निर्वाण दर्शन कहते हैं। इसके बाद तकरीबन 8 बजे पहला जलाभिषेक हुआ और पहली पूजा प्रधानमंत्री के नाम से की गई। 9 बजे बालभोग लगाया गया। दोपहर 12 बजे पूर्ण भोजन का भोग लगेगा। ये ही भोग ब्रह्मकपाल भेजा जाएगा। भोग पहुंचने के बाद ही वहां पहला पिंडदान होगा।

पहले दिन 20 हजार से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे, 7 लाख लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया

मंदिर को करीब 20 क्विंटल फूलों से सजाया गया है। पहले दिन दर्शन के लिए लगभग 20 हजार से ज्यादा लोग दर्शन के लिए पहुंचे। 11 मई की रात से ही हल्की बारिश होने लगी थी। इससे पहले मौसम विभाग ने 11 से 13 मई तक बारिश और बर्फबारी का अलर्ट जारी किया था। बद्रीनाथ धाम दर्शन के लिए 9 मई की शाम तक कुल 6 लाख 83 हजार लोगों के रजिस्ट्रेशन करवा लिया है।

तीन चाबियों से खुला कपाट का ताला

मंदिर कपाट का ताला तीन चाबियों से खुला। इनमें एक टिहरी राजदरबार, दूसरी चाबी बद्री-केदार मंदिर समिति के पास और तीसरी चाबी बद्रीनाथ धाम के रावल और पुजारियों के पास होती है, जिन्हें हक-हकूकधारी कहा जाता है। इससे पहले 11 मई को सुबह भगवान बद्रीनाथ की डोली पांडुकेश्वर मंदिर से रवाना हुई। पालकी में गरुड़ जी और शंकराचार्य की गद्दी थी। पांडुकेश्वर मंदिर से डोली में कुबेर और उद्धव जी की चलित प्रतिमा भी शामिल हुई। डोली के साथ मंदिर के रावल ईश्वरी प्रसाद नंबूदरी और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती थे। डोली 11 की शाम को मंदिर पहुंची।

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साभार : दैनिक भास्कर

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।