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भारतीय वैज्ञानिकों ने उच्च आयामी प्रणालियों में क्वांटम संलिप्तता को मापने का कारगर तरीका खोजा

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नई दिल्ली (मा.स.स.). क्वांटम संलिप्तता (ऐसी स्थिति जिसमें कई कण अलग होने पर भी एक इकाई की तरह व्यवहार करते हैं) पर वह प्रयोग, जिसे 2022 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार मिला है, ने भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा एक बड़ी उपलब्धि देखी है, जिन्होंने उच्च आयामी प्रणालियों में उलझाव अथवा संलिप्तता मात्रा को मापने का एक आसान तरीका खोजा है।

क्वांटम टेलीपोर्टेशन विषय पर अध्ययन [किसी एक प्रेषक से एक स्थान पर एक प्राप्तकर्ता (रिसीवर) से कुछ दूरी पर क्वांटम जानकारी स्थानांतरित करने के लिए एक तकनीक] प्रौद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए एक ऐसी उलझी हुई स्थिति की प्रभावकारिता के बेहतर मूल्यांकन को संभावित रूप से सक्षम बनाने में सहायता कर सकता है, जहां प्रक्रिया की सफलता और सटीकता संलिप्तता (एनटैंगलमेंट) की मात्रा के साथ-साथ अन्य क्वांटम संचार प्रोटोकॉल पर निर्भर करती है।

उलझी हुई अवस्था क्वांटम यांत्रिकी की एक महत्वपूर्ण स्थिति है और इसका उपयोग क्वांटम संचार, क्वांटम गणना और सूचना प्रसंस्करण कार्यों के लिए एक ऐसे संसाधन के रूप में किया जा सकता है जो शास्त्रीय प्रणालियों के लिए असंभव हैं। क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम संचार दोनों में उच्च आयामी सिस्टम (दो से अधिक आयाम) के लाभ सिद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार प्रायोगिक रूप से उच्च-आयामी उलझी हुई अवस्थाओं (हायर डायमेंशनल एनटैंगल्ड स्टेट्स) को साकार करने के साथ-साथ ऐसे उलझाव के परिमाणीकरण के अध्ययन का महत्त्व बहुत बढ़ जाता है।

अभी तक ऐसी संलिप्तता की मात्रा निर्धारित करने की दिशा में सभी प्रासंगिक जांचें मुख्य रूप से उलझाव उपायों पर सीमा (अधिकतम / न्यूनतम) प्रदान करने पर ही केंद्रित थी। क्वांटम अवस्था को चिह्नित करने की वर्तमान विधि क्वांटम स्टेट टोमोग्राफी (क्यूएसटी) है जिसका उपयोग ऐसे उलझाव को मापने के लिए किया जा सकता है। पर जैसे-जैसे इस परिवेश का आयाम बढ़ता है, तब इसके लिए बड़ी संख्या में मापदंडों के निर्धारण की आवश्यकता होती है। अब तक किसी भी अनियंत्रित उलझी हुई आयामी अवस्था के लिए ऐसी संलिप्तता के अनुभवजन्य / प्रयोगसिद्ध आकलन की कोई विधि उपलब्ध नहीं थी।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के एक स्वायत्त संस्थान, रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (आरआरआई) के वैज्ञानिकों ने क्वांटम कंप्यूटिंग संस्थान, कनाडा के वैज्ञानिकों के साथ सहयोगात्मक प्रयास में सांख्यिकीय सह-संबंध उपायों और किसी भी स्वेच्छित आयाम के लिए ज्ञात उलझाव उपायों के बीच विश्लेषणात्मक संबंध तैयार किए हैं। मापन के केवल दो प्रारूपों (सेटों) का उपयोग करके, उन्होंने प्रो. उर्वशी सिन्हा की अध्यक्षता में आरआरआई में क्वांटम सूचना और कंप्यूटिंग प्रयोगशाला में त्रि- आयामी फोटोनिक क्वाट्रिट्स की एक जोड़ी में संलिप्तता (एनटैंगलमेंट) की मात्रा को प्रयोगात्मक रूप से प्रमाणित किया है।

क्वांटम साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित उनका शोध क्वांटम स्टेट टोमोग्राफी (क्यूएसटी) के लिए अधिक प्रयोगात्मक रूप से अनुकूल और कम बोझिल विकल्प देता है। यह दो अलग-अलग संलिप्तता उपायों द्वारा परिमाणित अधिकतम (100% उलझी हुई) संलिप्तता की अवस्था से दी गई स्थिति में संलिप्तता के प्रतिशत विचलन की पड़ताल करता है। यह पहली बार उच्च आयामी क्वांटम अवस्था में संलिप्तता के विभिन्न उपायों के बीच इस गैर – समतुल्यता को प्रयोगात्मक रूप से प्रदर्शित भी करता है।

ये परिणाम अध्ययनों की उस एक पंक्ति में प्रवेश कर सकते हैं जिसका उद्देश्य न केवल इस बात की गहरी समझ पर प्रकाश डालना है कि ऐसी संलिप्तता को कैसे मापना है, बल्कि यह भी है कि किसी दिए गए तकनीकी अनुप्रयोग के लिए एक उलझी हुई स्थिति की प्रभावकारिता का बेहतर आकलन किस प्रकार किया जाए।

ऐसे अनुसंधान का केंद्रीय तकनीकी महत्व क्वांटम संलिप्तता के सक्षम सूचना प्रसंस्करण, क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम संचार प्रोटोकॉल के संदर्भ में है, जो 21वीं शताब्दी की क्वांटम प्रौद्योगिकियों के मध्य में है। क्वांटम टेलीपोर्टेशन और दूरस्थ अवस्था की तैयारी में अनुप्रयोगों के लिए प्रक्रिया की विश्वसनीयता किसी एक प्रासंगिक संलिप्तता प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न किए गए उलझाव की मात्रा पर निर्भर करती है। इसलिए, किसी भी प्रयोगात्मक रूप से निर्मित उलझी हुई स्थिति को यह देखते हुए कि अवस्था कितनी सीमा तक संलिप्त है, का गंभीर रूप से पूर्व आकलन किया जाना ही सहायता करता है। ठीक इसी आवश्यकता का ही इस शोध में समाधान किया गया है।

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