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भारत में लगातार हो रही पत्थरबाजी से कहीं आर्थिक विकास प्रभावित न होने लगे

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– प्रहलाद सबनानी

अभी हाल ही में अमेरिकी रेटिंग एजेंसी फिच ने भारतीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण (आउटलुक) में सुधार (अपग्रेड) किया है। फिच रेटिंग्स ने भारत की सॉवरेन रेटिंग के आउटलुक को “नकारात्मक” श्रेणी से अपग्रेड कर “स्थिर” श्रेणी में ला दिया है। भारत की सावरन रेटिंग में यह सुधार देश में तेजी से हो रहे आर्थिक सुधारों के कारण मध्यम अवधि के दौरान भारत की विकास दर में गिरावट की जोखिम के कम हो जाने के चलते किया गया है। भारत में आर्थिक मोर्चे पर इस तरह की बहुत सी अच्छी खबरों यथा पूरे विश्व में सबसे तेज गति से आर्थिक विकास करने वाली अर्थव्यवस्था, विदेशी व्यापार में तेज वृद्धि दर हासिल करने वाली अर्थव्यवस्था, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मा, मोबाइल फोन उत्पादन, ऊर्जा, औटोमोबील, यूनिकोन की संख्या में वृद्धि, आदि क्षेत्रों में पूरे विश्व में नायक्तव की भूमिका निभाने की स्थिति प्राप्त करना, आदि, को कई देश प्रतिस्पर्धता के चलते पचा नहीं पा रहे हैं। भारत द्वारा की जा रही तेज आर्थिक विकास दर एवं विदेशी व्यापार के क्षेत्र में हो रहे सुधार के चलते भारत की साख वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है। एशिया क्षेत्र से चीन, जापान के बाद भारत भी तेजी से एक आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है, जिसे विश्व के कई अन्य देश वैश्विक स्तर पर अपनी आर्थिक ताकत में कमी के रूप में देख रहे हैं। इसलिए भारत के आर्थिक विकास में कई प्रकार की बाधाएं खड़ी करने के प्रयास कुछ देशों द्वारा किए जा रहे हैं।

भारत में तेजी से हो रहे आर्थिक विकास के इत्तर आज अमेरिका एवं अन्य कई यूरोपीयन देश कई प्रकार की आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, विशेष रूप से इन देशों में लगातार तेजी से बढ़ रही मुद्रा स्फीति की दर से। इन सभी देशों में आज उपभोक्ता आधारित मुद्रा स्फीति की दर 8 प्रतिशत से अधिक हो गई है जो कि इन देशों में पिछले 43 वर्षों के इतिहास में सबसे अधिक है। इस समस्या से ये देश निजात पाने में असमर्थ से दिखाई दे रहे हैं एवं लगातार ब्याज दर में वृद्धि करते जा रहे हैं एवं सिस्टम (आर्थिक व्यवस्था) में तरलता कम करते जा रहे हैं जिससे इन देशों के निवासियों की क्रय शक्ति में कमी होती जा रही है। इन निर्णयों के चलते अब तो इन देशों में आर्थिक मंदी का खतरा मंडराने लगा हैं। जबकि भारत में उपभोक्ता आधारित मुद्रा स्फीति की दर 7 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है एवं आर्थिक विकास लगातार द्रुत गति से आगे बढ़ रहा है।

किसी भी देश के लिए आर्थिक विकास को गति देने के लिए देश में लगातार शांति बनाए रखना जरूरी माना जाता है। परंतु, चूंकि भारत आज पूरे विश्व में सबसे तेज गति से आर्थिक विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बन गया है, अतः भारत में अशांति फैलाने में कुछ देश संलग्न दिखाई दे रहे हैं। अभी हाल ही में दरअसल कुछ विकसित देशों के उकसावे में आकर कुछ अरब देशों यथा कतर,ओमान, सऊदी अरब एवं ईरान आदि ने भारत में हाल ही में एक टीवी चैनल पर एक बहस के दौरान एक भारतीय महिला द्वारा की गई एक टिप्पणी को लेकर इन देशों ने भारत से जवाब मांगा है। इस टिप्पणी को लेकर ही भारत के मुस्लिम समाज के अनुयायियों ने कई शहरों में पत्थरबाजी की है एवं सरकारी एवं व्यक्तिगत सम्पत्तियों को बहुत नुक्सान पहुंचाने का प्रयास किया है।  पूरे विश्व में आज भारत ही एक ऐसा देश है जहां इस देश के नागरिक आसानी से राष्ट्रीय एवं व्यक्तिगत संपतियों को नुक्सान पहुंचा सकते हैं एवं पोलिस एवं जनता पर पत्थर फैंक सकते हैं। कई देश इस तरह की गतिविधियों को भारत में फैलाने का प्रयास कर रहे हैं ताकि भारत में शांति भंग हो एवं देश का आर्थिक विकास प्रभावित हो।

चीन, जापान, इजराईल एवं कई यूरोपीयन देशों में किसी भी नागरिक द्वारा पत्थरबाजी एवं सरकारी अथवा व्यक्तिगत संपतियों को नुक्सान पहुचाने पर कड़े कानून लागू किए गए हैं अतः इन देशों में इस प्रकार की गतिविधियों पर पूर्णतः रोक लगा दी गई है। परंतु, भारत में बोलने की आजादी एवं प्रदर्शन करने की आजादी के चलते इस तरह की गतिविधियां हाल ही के समय में बहुत बढ़ी हैं। इससे भारत के आर्थिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ने की सम्भावनाएं बढ़ रही हैं।

भारत में मुस्लिम समाज को अब इस बात पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए कि देश के आर्थिक विकास में वे अपना योगदान किस प्रकार बनाए रखना चाहते हैं। यदि देश के आर्थिक विकास पर किसी भी प्रकार की आंच आती है तो इससे मुस्लिम समाज को ही सबसे अधिक नुक्सान होने वाला है। क्योंकि, आर्थिक विकास में कमी होने से गरीबी रेखा के आसपास जीवन यापन कर रहे लोगों पर बहुत अधिक विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः राष्ट्रवादी मुस्लिम समाज को अब आगे आकर अपनी भूमिका का निर्वहन करने की आवश्यकता है ताकि वे अपने समाज के लोगों को इस तरह की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाने हेतु प्रेरित कर  सकें। ऐसा बताया जा रहा है कि कतर में उक्त कारण से कुछ भारतीयों द्वारा किए गए प्रदर्शन पर वहां की सरकार ने इन भारतीयों को कतर से बाहर निकालने का निर्णय लिया है।

चीन में तो मुस्लिम समाज के लोग किसी भी प्रकार का प्रदर्शन आदि कर ही नहीं सकते बल्कि चीन में तो मुस्लिम समाज पर कई प्रकार के अत्याचार किए जा रहे हैं। इसी प्रकार बताया जा रहा है कि अभी हाल ही में सूडान ने अपने देश में इस्लाम के अनुपालन पर ही प्रतिबंध लगा दिया है। जापान ने भी इस्लाम धर्म का पालन करने वाले लोगों के लिए कड़े कानून लागू कर दिए हैं। एक समाचार के अनुसार नार्वे ने एक बड़ी संख्या में इस्लाम मजहब को मानने वाले लोगों को अपने देश से निकाल दिया है, इस कदम को उठाने के बाद नार्वे में अपराध की दर में 72 प्रतिशत तक की कमी आ गई है एवं वहां की जेलें 50 प्रतिशत तक खाली हो गई हैं तथा पोलिस अब नार्वे के मूल नागरिकों के हितों के कार्यों में अपने आप को व्यस्त कर पा रही है। विश्व के कई अन्य देशों ने भी इसी प्रकार के कठोर निर्णय लिए हैं। भारत को भी अब देश हित में पत्थरबाजी की घटनाओं को रोकने हेतु एवं सरकारी सम्पत्ति एवं व्यक्तिगत सम्पत्ति को नुक्सान पहुंचाने से रोकने हेतु कुछ कड़े नियमों को लागू किए पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदली हुई परिस्थितियों में सभी देश भारत के साथ व्यापार को बढ़ावा देना चाह रहे हैं। आज भारत के प्रथम पांच विदेशी व्यापार करने वाले देशों में तीन इस्लाम मजहब को मानने वाले राष्ट्र हैं। अमेरिका एवं चीन के बाद आज भारत से सबसे अधिक विदेशी व्यापार करने वाले देशों में यूनाइटेड अरब अमीरात, सऊदी अरब एवं ईराक हैं। भारतीय मुस्लिम समाज के नागरिकों को इस बात पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए कि जब विश्व के अन्य इस्लाम मजहब को मानने वाले देश भारत के साथ अपने विदेशी व्यापार को लगातार बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं एवं भारत के साथ विशेष मुक्त व्यापार समझौते कर रहे हैं ऐसे में भारत में अस्थिरिता फैलाने में वे अपना योगदान कैसे दे रहे हैं इससे हो सकता है कि भारत की आर्थिक प्रगति विपरीत से प्रभावित होने लगे। इसलिए राष्ट्र हित में अब भारत के मुस्लिम समुदाय को पत्थर फैंकने एवं सरकारी सम्पत्ति और व्यक्तिगत संपत्ति को नुक्सान पहुंचाने जैसे कार्यों से अपने आप को बचाना चाहिए। कहीं भारतीय मुस्लिम समाज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी षड्यंत्र का जाने-अनजाने में हिस्सा तो नहीं बन रहे हैं।

लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं.

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