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बिना राष्ट्रभाषा कैसा अमृत महोत्सव ?

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– डॉ. घनश्याम बादल

आज देश फिर राष्ट्र भाषा हिंदी दिवस मना रहा है । पर, कड़वी सच्चाई यही है कि हिंदी आज भी संवैधानिक रूप से हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है । भारत में भाषाओं का वैविध्य देखने में आता है । देश में अनेक भाषाएं हैं और विविधता के बीच राजनीति इतनी कि हिंदी को स्वीकार करने के लिए देश का एक हिस्सा तैयार नहीं है । इस विवाद के चलते हुए आज तक इस देश को अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं मिल पाई है।‌‌

कब पाएगी हिंदी अमृतरस :

हर वर्ष सितंबर के महीने में हिंदी सप्ताह व हिंदी पखवाड़े मनाए जा रहे हैं और कामना की जाती है कि हिंदी भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा बने मगर आजादी के 75 बाद भी भारत अपनी एक राष्ट्रभाषा नहीं चुन पाया है। ऐसी हास्यास्पद स्थिति दुनिया के किसी भी देश की शायद ही हो । छोटे-छोटे से देश भी अपनी राष्ट्रभाषा में कार्य करके प्रगति कर हैं पर हम अपनी ही भाषा हिंदी को उसके हिस्से का अमृत आजादी के अमृत महोत्सव पर भी नहीं दिला पाए।

संकल्प जो अधूरा है :

देश में 129 भाषाएं संविधान की आठवीं सूची में दर्ज हैं, आजादी के बाद यह निर्णय लिया गया था कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा होगी और आजादी के 15 वर्षों में हिंदी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाएगा मगर यह संकल्प आज तक भी पूर्ण नहीं हो पाया है और न ही निकट भविष्य में भी हिंदी के राष्ट्रभाषा बनाने का सपना पूरा होता दिख नहीं रहा है।

हिंदी ही हो राष्ट्रभाषा :

क्या हमारी अपनी एक राष्ट्रभाषा नहीं होनी चाहिए ? और हिंदी के अतिरिक्त क्या कोई दूसरी भाषा भारत राष्ट्र में राष्ट्रभाषा का स्थान ले सकती है ? बहुत स्वाभाविक उत्तर है नहीं । मगर हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की बात जब भी उठी, देश के एक विशेष हिस्से से उसके विरोध के स्वर मुखरित होते रहे और क्षेत्रीय राजनीति हिंदी का राष्ट्रभाषा होने का हक बड़ी चतुराई से लील गई । उसी का परिणाम सामने है कि हम एक राष्ट्रभाषाहीन राष्ट्र हैं ।

राष्ट्रभाषा हीन देश :

विश्व के हर बड़े मंच पर आज भारत की आवाज़ की महत्ता बढ़ी है मगर हम खुद भी नहीं जानते कि हमारी आवाज़ क्या है ? ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आवाज़ के लिये अपनी एक भाषा का होना बेहद ज़रुरी है और हमारी अधिकारिक रूप से कोई राष्ट्र-भाषा न होना हमारी कमजोरी हेै ।

संविधान में हिंदी का स्थान :

संसदीय कार्यवाही के लिए कई भाषाएं हैं, संविधान की 26 वीं अनुसूची में यें भाषाएं दर्ज हैं पर आज भी दासता की प्रतीक अंग्रेजी ही हमारी अधिकृत भाषा बनकर सामने आई है। भले ही उत्तर भारत के निवासी भावनात्मक रूप से देवनागिरी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देते हैं पर संविधान उसे ऐसा कोई दर्जा नहीं देता हैऔर वह भी दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की तरह ही एक भाषा मात्र है जिसे राज्य व केन्द्र सरकारें अपने काम काज में लाएं या न लाएं उनकी मर्जी पर है ।

राजनैतिक विरोध क्यों ? :

बाहर की तो छोड़िए भारत के ही कुछ राज्यों में हिन्दी का विरोध जमकर होता रहा है । क्षेत्रीय हितों की हिमायत का बहाने से वहां हिन्दी का विरोध जारी है । ऐसे कई राज्य हैं जहां का सारा सरकारी काम या तो अंग्रेजी में होता है या वहां की स्थानीय भाषा में । तमिलनाड़ु, आंध्र, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, असम, मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर, गोवा, महराष्ट्र आदि में हिन्दी के विरोध का सहारा लेकर सत्ता हासिल करना एक राजनैतिक खेल बन गया है ।

हास्यास्पदअनुवाद :

केन्द्र सरकार राज्यों की स्वायत्तता की बात कह कर इसमें हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करती है तो इससे दूसरे कुछ राज्यों की महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ रही हैं जैसे पंजाब भी अब चाहता है कि उसे गुरमुखी में ही काम करना चाहिए, हिमाचल में भी डोगरी के प्रति जूनून बढ़ रहा है और हिन्दी प्रधान माने जाने वाले उत्तरप्रदेश , मध्यप्रदेश , हरियाणा व राजस्थान में भी सरकारी कामों में अधिकतर पहले अंग्रेजी का प्रयोग होता है फिर उसका क्लिष्ट अनुवाद देवनागरी में किया जाता है और कई बार तो यह अनुवाद इतना स्तरहीन होता है कि हास्यास्पद बन जाता है । अब ऐसी स्थिति में हिन्दी का उन्नयन हो भी तो कैसे ?

हिंदी है अनुपम भाषा …..

हिन्दी का प्रयोग न करने या न कर पाने के पीछे कई बार बहुत ही थोथा तर्क दिया जाता है कि हिन्दी में कारगर शब्दावली ही नहीं है । किसी हद तक यह बात एकदम गलत भी नहीं है पर यह कहना कि हिन्दी एक कमजोर या अक्षम भाषा है हज़म नहीं होता । दुनिया भर के विद्वान मान चुके हैं कि हिन्दी जैसी समर्थ भाषाएं बहुत ही कम हैं और जहां तक उसके वैज्ञाानिक व व्याकरणीय होने का प्रश्न है तो उसमें तो वह बेजोड़ भाषा के रूप में उभरी है । कम से कम अंग्रेजी से तो इस संदर्भ में वह बहुत आगे है जिसका न कोई सटीक ध्वनि विज्ञान है न ही उच्चारण का वैज्ञानिक सर्वमान्य मानक ।

विद्वानों का अहम भारी :

हिन्दी के विद्वानों ने जितना जोर अपना वर्चस्व बढा़ने में लगाया है अगर उसका शतांश भी हिन्दी के संवर्द्धन व विकास में लगाते, उसकी शब्दावली व शब्दकोष को बढ़ाते, उसे सार्थक, सरल,सहज व ऐसे उपयोगी शब्द दे पाते जो बोलने में आसान व प्रचलन में आने लायक होते, उसे क्लिष्टता के प्रेत से मुक्ति दिलाने का ईमानदार प्रयास करते, खेमेबाजी से बच, अपने और सहयाोगी बोलियों, भाषाओं के विद्वानों के साथ मिलकर काम करते तो हिन्दी आज सिरमौर भाषा होती । लेकिन खेद का विषय है कि विद्वानों के लिए हिंदी हित नहीं बल्कि अपना अहम अधिक महत्वपूर्ण हो गया है ।

जरूरी है बदलाव भी :

अंत में समय के अनुरूप बदलाव जरूरी है , इसलिए हिंदी को अधिकाधिक कंप्यूटर व डिजिटल युग के अनुसार विकसित व संवर्धित करना होगा और बाजार व रोजगार में प्रयुक्त होने वाली हिंदी को भी खुले मन से स्वीकार करना होगा । रूढ़िवादी सोच से बाहर आकर व्यवहारिक को इस तरह अपनाना होगा जिससे हिंदी का मूल स्वरूप भी सुरक्षित रहे ।

 लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व साहित्यकार हैं.

नोट – लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है.

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