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जम्बूद्वीप के विभाजन का मौन समर्थन करती रही कांग्रेस

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– सारांश कनौजिया

भारत का पुराना नाम जम्बूद्वीप या आर्यावर्त भी है. किन्तु जब यह नाम प्रचलन में था, तब वर्तमान एशिया का बड़ा भाग इसमें आता था. समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग राजा हुए. इन राजघरानों के कमजोर होने पर यहां बाहरी शक्तियों ने अधिकार जमा लिया. जब अंग्रेजों ने भारत पर आक्रमण किया था, तब भी इस जम्बू द्वीप में आज के कई देश आते थे. इनमें अधिकांश का विभाजन कांग्रेस की स्थापना के बाद हुआ. भारत – पाकिस्तान विभाजन का कांग्रेस ने मौखिक विरोध किया, लेकिन शेष देशों को तो ऐसे ही जाने दिया.

कांग्रेस की स्थापना 1985 में हुई. इसलिए उसके बाद हुए भारत के विभाजन की ही चर्चा कर लेते हैं. 1907 में भूटान हमसे अलग हो गया. इसी समय तिब्बत को दो भागों में बांट दिया गया, एक भाग चीन के पास चला गया. शेष बचा हुआ भाग भी चीन ने 1951 में हथिया लिया. 1923 में नेपाल भी हमसे अलग हो गया. इसी तरह 1948 में म्यांमार और श्रीलंका को भी अलग देश की मान्यता मिल गई. जम्बू द्वीप में शामिल अन्य देश इंडोनेशिया, कम्बोडिया, मलेशिया और सिंगापुर भी स्वतंत्र होते चले गए. ये सभी देश कभी भारतीय भूभाग ही थे. इंडोनेशिया नीदरलैंड और कंबोडिया फ्रांस के कब्जे में था, शेष भूभाग अंग्रेजों या कांग्रेस की मेहरबानी के कारण भारत से अलग हो गए.

आज कांग्रेस एक बार फिर सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर लगे गंभीर आरोपों का बचाव देश की स्वतंत्रता की लड़ाई को ढाल बनाकर कर रही है. इसलिए उपरोक्त उदाहरणों को रखना जरुरी है. स्वयं कांग्रेसी भी कभी नहीं बताते कि इस जम्बूद्वीप को विभाजित होने से बचाने के लिए उन्होंने कब और क्या किया. वास्तव में कांग्रेस अपने स्थापना काल से हमेशा अंग्रेजी सत्ता में अधिक भागीदारी के लिए एक विपक्षी दल की तरह संघर्ष करती रही. उसकी मंशा कभी अंग्रेजों को भारत से निकालने की नहीं थी. इसलिए उसने 1942 तक कभी भी अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन जैसा कुछ नहीं चलाया. इस आंदोलन की वास्तविकता हम फिर कभी आपके सामने रखेंगे.

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं.

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