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स्वतंत्रता पूर्व की कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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– सारांश कनौजिया

जब भी भारत की स्वतंत्रता के संग्राम की बात आती है. कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि कांग्रेस नहीं होती तो हम गुलाम ही बने रहते. किन्तु क्या यही सत्य है. कांग्रेस के पास इसको साबित करने के लिए कई ऐतिहासिक दस्तावेज हैं. बहुत सी पुस्तकें हैं. किन्तु वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अंग्रेजों का साथ देने जैसे गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं. कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अब संघ समर्थक इनका प्रतिवाद भी कर रहे हैं. दोनों पक्षों की बात सुने बिना यह निर्णय लेना ठीक नहीं होता कि कौन सही है और कौन गलत. कांग्रेस क्यों सही लगती है, इसके पीछे के कई कारण आपको पता होंगे. किन्तु संघ समर्थकों को आरएसएस क्यों सही लगती है. इसके कारण बहुत कम लोगों को पता होंगे. इसलिए हम आपको इसी दूसरे पक्ष के दर्शन कराना चाहते हैं.

कांग्रेस ने अपने अधिकांश आंदोलन गांधी जी के भारत वापस आने के बाद किये. किन्तु यह भी सत्य है कि उसने अपने सभी आंदोलन बीच में ही छोड़ दिए. कांग्रेस स्थापना के बाद सिर्फ बंग-भंग ही एक ऐसा आंदोलन था, जो सफल रहा. लेकिन यह आंदोलन बंगाल के लोगों ने चलाया. इसमें वो लोग भी शामिल थे, जो बंगाल में कांग्रेस से जुड़े थे. बंगाल के बाहर भी कुछ राष्ट्र भक्त कांग्रेसियों ने इसे समर्थन दिया, लेकिन तब तक गांधी जी कांग्रेस से नहीं जुड़े थे.

कुछ लोग इस बात से असहमत होकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की बात करेंगे. अंग्रेज भारत को छोड़ देंगे, यह घोषणा 1946 में हुई. 1945 में भारत छोड़ों आंदोलन किस गति से चल रहा था. क्या आपको इसका कोई उल्लेख कांग्रेस की किताबों में भी मिलता है. वास्तव में कुछ लोगों ने इसे शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन इससे पहले कि यह आंदोलन राष्ट्रीय रूप लेकर अंग्रेजों के लिए परेशानी खड़ी करता, इसे कांग्रेस ने अपना समर्थन देना बंद कर दिया. इसलिए हो सकता है कि आपको बहुत खोजने पर भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ा कोई मामला 1943 का मिल जाए, लेकिन उसके बाद क्या? मतलब स्पष्ट है, भारत को स्वतंत्रता इस आंदोलन के कारण नहीं मिली.

वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन था. इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्वयं कांग्रेसी थे, लेकिन जिस प्रकार कांग्रेस चल रही थी, उसके तरीके से असंतुष्ट होने के बाद उन्होंने एक नए गैरराजनीतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 1925 में की. वो 1940 में  अपनी मृत्यु तक कांग्रेस के नेताओं और क्रांतिकारी विचार वालों के संपर्क में रहे. स्वयं डॉ. हेडगेवार ने कांग्रेसी नेताओं के साथ जंगल सत्याग्रह में भाग लिया था. उनके बाद जब गुरूजी संघ के प्रमुख (सरसंघचालक) बने, तब तक कांग्रेस ने अपने नेताओं को संघ की गतिविधियों में भाग लेने से मना कर दिया था. इसलिए कांग्रेसी या तो पूरी तरह संघ से जुड़ गए या सिर्फ कांग्रेस के ही होकर रह गए. क्रांतिकारी विचारों वाले व्यक्ति अभी भी संघ के संपर्क में बने रहे.

डॉ. हेडगेवार के समय से ही कांग्रेसी शीर्ष नेतृत्व को संघ की गतिविधियां पसंद नहीं थी. गांधीजी सहित कोई भी यह नहीं चाहता था कि डॉ. हेडगेवार कांग्रेस से अलग विचार वाला कोई संगठन बनाए. ऐसे में यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि कांग्रेस और संघ में वैचारिक अंतर क्या था? कांग्रेस अंग्रेजों की गुलामी को स्वीकार करते हुए भारतीयों के लिए अधिक अधिकार की मांग कर रही थी. उसे अंग्रेजों की भारत में उपस्थिति से कोई समस्या नहीं थी. जबकि डॉ. हेडगेवार चाहते थे कि अंग्रेज भारत छोड़ कर चले जायें और उसके बाद भारत को कैसे चलाना है, यह सभी भारतीय मिलकर तय करें, उसमें अंग्रेजों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई हस्तक्षेप न हो. गांधीजी किसी भी कीमत पर मुसलामानों को नाराज नहीं करना चाहते थे, जबकि डॉ. हेडगेवार सनातन भारतीय संस्कृति के अनुसार देश को चलाने पर विश्वास रखते थे, जिसमें धर्म का अर्थ कर्तव्य होता है न कि संप्रदाय. उनका स्पष्ट मानना था कि पूजा पद्धति कुछ भी हो, लेकिन जो इस देश की संस्कृति और सभ्यता का सम्मान नहीं करता, उसकी बात सुनने का कोई लाभ नहीं है.

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