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बहू के प्राइवेसी मांगने पर दिया था तीन तलाक, कोर्ट ने किया रद्द

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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इंदौर. एक महिला के पक्ष में इंदौर की फैमिली कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, वह ऐतिहासिक बन गया. दरअसल, महिला को उसके पति ने तीन तलाक दे दिया था. इस पर उसने फैमिली कोर्ट में केस दायर कराया और कारण बताया कि प्राइवेसी के चलते वह अलग कमरे की मांग कर रही थी. इसी के चलते पति ने तीन तलाक दे दिया. मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि घर में परिवार के साथ रहने के दौरान प्राइवेसी मिलना भी बहू का हक है. यदि वह संयुक्त परिवार में अपने लिए अलग कमरा मांगती है तो यह गलत नहीं है. कोर्ट ने तीन तलाक को नाजायज ठहराते हुए पत्नी को साथ रखने के आदेश दिए हैं.

यह था मामला
एडवोकेट प्रमोद जोशी के अनुसार, मोती तबेला इलाके में रहने वाली महिला का निकाह 2011 में उज्जैन में हुआ था. 2012 में उन्हें बेटी हुई. परिवार संयुक्त था. इसमें जेठ-जेठानी भी शामिल थे. घर छोटा होने के चलते महिला को पति के साथ खुले ड्रॉइंग रूम में रहना पड़ रहा था. उसने घर में अलग कमरे की मांग की तो विवाद होने लगा. मई 2014 में पति ने मायके छोड़ दिया और बाद में तीन तलाक दे दिया.

यह बताया था कोर्ट में
महिला ने 2018 में इस संबंध में कोर्ट को जानकारी दी थी कि- मेरे ससुराल में नौ लोग और मेरे दो बच्चे सिर्फ तीन कमरे और एक किचन में रहते हैं. बाहर वाले बैठक कक्ष (ड्रॉइंग रूम) को मुझे रहने के लिए दिया गया है, वहां गेट भी नहीं है. संयुक्त परिवार में निजता नहीं होने से भी विवाद का कारण बना.

सिर्फ एक कमरा चाहती थी
एडवोकेट ने बताया, महिला अपने पति के साथ ही रहना चाहती है. संयुक्त परिवार होने से अपने लिए सिर्फ अलग कमरा भी प्राइवेसी के लिहाज से चाहती थी. इस पर पति का कहना था कि मैं तुम्हें तलाक दे चुका हूं.

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5 साल बाद फैसला
नवंबर 2018 में पीड़िता ने इंदौर की फैमिली कोर्ट में केस दायर किया था. 5 साल बाद कोर्ट ने फैसले में कहा, पति ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन (2017) के अनुसार तीन तलाक लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की है, इसलिए यह अवैध है. उसे पत्नी के साथ रहना होगा.

महिला को निजता का अधिकार
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा- फतवा ए आलमगीरी में भी महिला को निजता का अधिकार है. वह सुरक्षा के लिहाज से भी प्राइवेसी की मांग कर सकती है. कोर्ट ने इस्लामिक लॉ के रिफरेंस भी फैसले में उल्लेखित किए हैं. प्रथम प्रधान न्यायाधीश संगीता मदान ने आदेश में मुस्लिम लॉ, शरीयत के अलावा सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का विस्तृत उल्लेख किया है.

साभार : न्यूज़18

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।