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मंगल पाण्डेय

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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अंग्रेज जिस प्रकार भारतीय राजाओं से सत्ता छीन रहे थे। कहीं उत्तराधिकारी विवाद को पैदा कर, तो कहीं कोई अन्य कारण बता कर। इस कारण इन सभी में अंग्रेजों के खिलाफ भारी असंतोष था। कुछ स्थानों पर संघर्ष भी देखने को मिला। अभी तक हमने जिन भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बारे में पढ़ा, उनका सीधा सम्बन्ध मंगल पाण्डेय के बलिदान के बाद शुरू हुए सशस्त्र संघर्ष से नहीं था। यद्यपि उनके प्रमुख संघर्ष का कालखंड यही था। इसके बाद भी यह बात ध्यान देने वाली है कि अंग्रेज सरकार और भारतीयों के बीच होने वाले इन संघर्षों में तेजी मंगल पाण्डेय को फांसी देने के बाद ही आई। अंग्रेजों ने मंगल पाण्डेय को 10 दिन पहले फांसी दी, इससे स्पष्ट हैं कि उन्हें भी इस बात की भनक लग गई थी की अब माहौल उनके विरुद्ध है। मंगल पाण्डेय के द्वारा विद्रोह की घोषणा करने के बाद पैदा हुए माहौल से अंग्रेजों को डर लगने लगा था।

29 मार्च 1857 को जब गाय और सूअर की चर्बी वाले कारतूसों को बांटा जा रहा था, तो मंगल पाण्डेय ने इसका विरोध किया। अंग्रेजों ने मंगल पाण्डेय की वर्दी और हथियार छीन लेने का आदेश दे दिया। जब अंग्रेज अधिकारी मेजर ह्यूसन आगे बढ़ा, तो मंगल पाण्डेय ने उसे मौत के घाट उतार दिया। इसमें उनकी सहायता ईश्वरी प्रसाद ने की। इसके बाद मंगल पाण्डेय ने एक दूसरे अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बॉब को भी मार डाला। जनरल जान हेएरसेये के अनुसार जब अंग्रेजों ने जमींदार ईश्वरी प्रसाद से मंगल पाण्डेय को गिरफ्तार करने के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया। वहां उपस्थित भारतीय सैनिकों ने भी ऐसा करने से मना कर दिया, सिर्फ एक सैनिक शेख पलटू सामने आया। इस कारण अंग्रेजों ने मंगल पाण्डेय के साथ ही ईश्वरी प्रसाद को भी गिरफ्तार कर लिया। 6 अप्रैल 1857 को कोर्ट मार्शल कर मंगल पाण्डेय को 18 अप्रैल 1857 को फांसी देने का निर्णय सुनाया गया। इसके बाद अंग्रेजों को एक और झटका तब लगा, जब बैरकपुर छावनी में तैनात जल्लादों ने मंगल पाण्डेय को फांसी देने से ही मना कर दिया, इसके बाद अंग्रेजों को कोलकाता से जल्लाद बुलाने पड़े। इससे डरे अंग्रेजों ने मंगल पाण्डेय को 10 दिन पहले 8 अप्रैल 1857 को ही फांसी दे दी।

इसके कुछ दिन बाद ही 21 अप्रैल 1857 को उनका सहयोग करने के आरोप में ईश्वरी प्रसाद को भी अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया। इन दोनों क्रांतिकारियों के संघर्ष का समय भले ही कुछ घंटे या कुछ दिन रहा हो, लेकिन इस बलिदान की चर्चा किसी आग की तरह पूरे देश में फैल गई। परिणाम यह हुआ कि जगह-जगह अंग्रेज सरकार से संघर्ष शुरू हो गया। सभी अपने-अपने स्तर पर इस लड़ाई को आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन कोई एक सक्षम नेतृत्वकर्ता न होने के कारण यह प्रयास लगभग दो वर्ष तक चलने के बाद अंग्रेजों द्वारा कुचल दिया गया।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।