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बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर बढ़ती हिंसा: अंतरराष्ट्रीय समुदाय और भारत ने जताई गंभीर चिंता

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ढाका. बांग्लादेश में पिछले कुछ हफ्तों से जारी राजनीतिक अस्थिरता के बीच अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में भारी वृद्धि देखी गई है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, देश के विभिन्न हिस्सों में मंदिरों में तोड़फोड़, आगजनी और हत्या के चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों को लेकर बहस छेड़ दी है।

प्रमुख घटनाएं और मौजूदा स्थिति

हालिया तनाव का मुख्य कारण ‘इंकलाब मंच’ के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की हत्या को बताया जा रहा है, जिसके बाद भड़की हिंसा में अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया गया।

  • मैमनसिंह और राजबारी में हत्याएं: हाल ही में मैमनसिंह में एक हिंदू युवक (दीपु चंद्र दास) की पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग) कर दी गई। भारत सरकार ने इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है।

  • मंदिरों और संपत्तियों पर हमले: ढाका, फरीदपुर और चटगांव जैसे इलाकों में हिंदू मंदिरों में मूर्तियों के खंडित होने और घरों में आगजनी की खबरें मिली हैं।

  • आंकड़े: भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान अब तक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 2,900 से अधिक घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।

भारत और संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया

भारत ने इस मुद्दे पर अपना रुख कड़ा करते हुए बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।

  • भारत का बयान: विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी यह ‘अविराम शत्रुता’ अत्यंत चिंताजनक है और अपराधियों को जल्द से जल्द सजा मिलनी चाहिए।

  • संयुक्त राष्ट्र (UN): यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है और कहा है कि अल्पसंख्यकों सहित सभी नागरिकों को सुरक्षित महसूस कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

बांग्लादेश सरकार का पक्ष

हालांकि, मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने इन दावों को कई बार ‘अतिशयोक्ति’ बताया है। बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय का कहना है कि इन घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देना तथ्यात्मक रूप से गलत है और वे कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

आगामी चुनाव और असुरक्षा का माहौल

फरवरी 2026 में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले इस तरह की हिंसा ने भय का माहौल पैदा कर दिया है। अल्पसंख्यक संगठनों (जैसे बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद) ने मांग की है कि राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दें।

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यह भी पढ़ें : 1857 का स्वातंत्र्य समर : कारण से परिणाम तक

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