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इंदिरा नूयी का बड़ा बयान: ‘भारत में रहती तो शायद कभी CEO नहीं बन पाती’, चीन को बताया ज्यादा व्यवस्थित

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हूवर इंस्टिट्यूशन के इंटरव्यू में भारत और चीन की व्यवस्था पर बोलते हुए पेप्सिको की पूर्व सीईओ इंदिरा नूयी की तस्वीर।

बीजिंग । गुरुवार, 2 जुलाई 2026

भारतीय मूल की दिग्गज कॉरपोरेट लीडर और पेप्सिको (PepsiCo) की पूर्व सीईओ इंदिरा नूयी (Indra Nooyi) ने हाल ही में भारत, चीन और अमेरिका की व्यवस्थाओं को लेकर एक बेहद बेबाक इंटरव्यू दिया है। हूवर इंस्टिट्यूशन (Hoover Institution) को दिए इस इंटरव्यू में उनके कुछ बयानों पर वैश्विक व्यापार जगत और सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है। नूयी ने अमेरिका की योग्यता आधारित व्यवस्था (Meritocracy) की जहां जमकर तारीफ की, वहीं भारत के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और चीन की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर कुछ ऐसी व्यावहारिक बातें कहीं जो आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य में बेहद महत्वपूर्ण हैं।

‘अगर भारत में रहती तो कभी CEO नहीं बन पाती’

इंटरव्यू के दौरान इंदिरा नूयी ने अमेरिका की तारीफ करते हुए कहा कि वहां की मेरिट-बेस्ड सिस्टम (योग्यता आधारित व्यवस्था) ने उन्हें वह मुकाम दिलाया, जो शायद उनके लिए भारत में हासिल करना मुमकिन नहीं था।

उन्होंने अपने सफर को याद करते हुए कहा, “एक अप्रवासी (Immigrant) खाली हाथ अमेरिका आता है और एक प्रतिष्ठित अमेरिकी कंपनी का सीईओ बन जाता है। ऐसा दुनिया के किसी और देश में होना लगभग असंभव है। अगर मैं भारत में ही रह जाती, तो शायद कभी किसी बड़ी कंपनी की सीईओ नहीं बन पाती।”

नूयी के इस बयान को कॉरपोरेट जगत में अमेरिका के ‘ओपन कल्चर’ और टैलेंट को पहचान देने वाली नीति के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।

चीन की तारीफ और भारत की ‘अव्यवस्थित खूबसूरती’ पर राय

भारत और चीन के विकास मॉडल और रहन-सहन की तुलना करते हुए इंदिरा नूयी ने एक व्यावहारिक और जमीनी अंतर साफ किया। उन्होंने कहा कि एक पर्यटक (Tourist) के नजरिए से चीन में वक्त बिताना भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान और सुविधाजनक है।

  • व्यवस्थित बनाम अव्यवस्थित: उन्होंने कहा, “अगर आपको पूरी तरह से साफ-सुथरी और व्यवस्थित (Organized) जिंदगी पसंद है, तो आपके लिए भारत में तालमेल बिठाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। लेकिन भारत की असली खूबसूरती ही उसकी अव्यवस्था (Chaos) में छिपी है।”

  • सड़कों का उदाहरण: उन्होंने भारतीय सड़कों पर गाड़ियों के बीच से रास्ता बनाती गायों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीयों की यह एक अनूठी कला है कि वे इस अव्यवस्थित माहौल में भी बिना किसी शिकायत के अपना रास्ता बखूबी निकाल लेते हैं।

1960-70 का भारत और आज की महिलाएं: एक जरूरी सुधार

नूयी ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए 1960 और 1970 के दशक के भारतीय समाज का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस दौर में महिलाओं की सामाजिक भूमिका काफी सीमित थी और ज्यादातर महिलाओं का दायरा घर-परिवार तक ही सिमटा हुआ था।

तथ्यात्मक सुधार और आज की स्थिति: हालांकि, नूयी के इस बयान के साथ यह देखना भी जरूरी है कि पिछले कुछ दशकों में भारत में महिला नेतृत्व और कॉर्पोरेट जगत में उनकी भागीदारी में तेजी से बदलाव आया है। आज भारत की कई बड़ी टेक कंपनियों, बैंकिंग सेक्टर और स्टार्टअप्स की कमान महिलाएं संभाल रही हैं। खुद नूयी ने यह माना कि उनके पिता और दादा की प्रगतिशील सोच ने उन्हें उस दौर में भी बड़े सपने देखने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जिसके दम पर वह उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जा सकीं।

लोकतंत्र बनाम केंद्रीकृत व्यवस्था (Centrally Controlled System)

विकास की रफ्तार पर बात करते हुए उन्होंने चीन के ‘केंद्रीकृत मॉडल’ और भारत के ‘लोकतांत्रिक मॉडल’ की तुलना की। उन्होंने माना कि चीन ने अपनी सेंट्रलाइज्ड व्यवस्था के कारण फैसले बहुत तेजी से लागू किए और बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास किया। इसके विपरीत, भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के कारण फैसले लेने में समय लगता है।

इसके बावजूद, उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की सराहना करते हुए कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्थिरता और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण (Peaceful Transfer of Power) है, जो इसे दीर्घकालिक रूप से मजबूत बनाता है।

भारत-अमेरिका संबंध: भविष्य के ‘नेचुरल पार्टनर’

बदलते वैश्विक और रणनीतिक माहौल में इंदिरा नूयी ने भारत और अमेरिका को एक-दूसरे का ‘नेचुरल पार्टनर’ (स्वाभाविक साझेदार) बताया। उन्होंने भारत की तीन सबसे बड़ी ताकतों का जिक्र किया:

  1. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होना।

  2. युवाओं की एक विशाल और ऊर्जावान आबादी (Demographic Dividend)।

  3. अंग्रेजी बोलने वाले प्रोफेशनल्स और सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग व एआई (AI) के क्षेत्र में काम कर रही बेहतरीन प्रतिभाएं।

उनके अनुसार, ये खूबियां भारत को वैश्विक स्तर पर अमेरिका का सबसे भरोसेमंद और महत्वपूर्ण रणनीतिक व व्यापारिक साझेदार बनाती हैं।

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