जयपुर। शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
राजस्थान की जेलों में बंद कैदियों के कल्याण और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के ढुलमुल रवैए पर गंभीर नाराजगी जताई है। अदालत ने प्रदेश की हाई सिक्योरिटी जेलों में लगातार सामने आ रही सुरक्षा चूक (Security Lapses) को राज्य की कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा माना है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश मनीष शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में लिए गए सुओ मोटू (स्वप्रेरित प्रसंज्ञान) पर सुनवाई करते हुए पूछा कि आखिर सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली जेलों में मोबाइल फोन और कैमरे जैसी प्रतिबंधित वस्तुएं आसानी से कैसे पहुंच रही हैं?
हाई सिक्योरिटी जेलों में सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न
सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विशेष सुरक्षा वाली जेलों (High-Security Prisons) में भी इस तरह की गैर-कानूनी गतिविधियां धड़ल्ले से चल रही हैं, तो यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। अदालत ने इस बात पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया कि जैमर्स और कड़ी निगरानी के दावों के बावजूद कैदी न केवल मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं, बल्कि वहां से आपराधिक नेटवर्क भी संचालित कर रहे हैं।
अदालत की बड़ी टिप्पणी: “यदि हाई सिक्योरिटी जेलों के भीतर प्रतिबंधित सामग्री और संचार उपकरण पहुंच रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर जेल प्रशासन की मिलीभगत या घोर लापरवाही को दर्शाता है। इसमें नीचे से लेकर ऊपर तक जवाबदेही तय होना अनिवार्य है।”
मुख्यमंत्री तक को जेल से धमकी, प्रशासन मौन क्यों?
खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक और बेहद चौंकाने वाले पहलू का जिक्र किया। अदालत ने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री तक को जेल परिसर के भीतर से धमकी मिलने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। कोर्ट ने सरकार के वकील से कड़े सवाल पूछते हुए कहा कि जब मामला राज्य के सर्वोच्च कार्यकारी पद की सुरक्षा और इतने गंभीर विषय से जुड़ा है, तो अब तक संबंधित जेल अधिकारियों के खिलाफ क्या दंडात्मक कार्रवाई की गई है?
अदालत ने कहा कि केवल जांच समितियों का गठन करना या खानापूर्ति करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस प्रकार की प्रशासनिक लापरवाही के लिए जिम्मेदार अफसरों पर सख्त एक्शन लिया जाना चाहिए।
न्यायमित्र ने उठाए जेलों की दुर्दशा और हत्याओं के मुद्दे
इस मामले में अदालत द्वारा नियुक्त किए गए न्यायमित्र (Amicus Curiae) प्रतीक कासलीवाल ने जेलों की वास्तविक और डरावनी स्थिति से पीठ को अवगत कराया। उन्होंने दलील दी कि प्रदेश की जेलों में बुनियादी सुरक्षा ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है।
कासलीवाल ने कोर्ट के सामने दो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु रखे:
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कुख्यात अपराधियों की असुरक्षा: जेल के भीतर कुख्यात अपराधी जगन गुर्जर की हत्या जैसी वारदातें यह बताती हैं कि कैदियों की आपसी रंजिश और सुरक्षा प्रबंधन को लेकर प्रशासन कितना लापरवाह है।
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तकनीकी विफलता: न्यायमित्र ने खुलासा किया कि जिस समय जेलों में ऐसी गंभीर हिंसक घटनाएं या हत्याएं होती हैं, उस समय परिसर में लगे कई महत्वपूर्ण सीसीटीवी (CCTV) कैमरे भी ठीक से काम नहीं कर रहे होते हैं। यह तकनीकी खामी जानबूझकर पैदा की जाती है या लापरवाही से, इसकी जांच होनी चाहिए।
राजस्थान सरकार से मांगी गई विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और जेल महानिदेशक को एक व्यापक और विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने विशेष रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है:
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सुरक्षा में हुई चूकों और मोबाइल बरामदगी के मामलों में अब तक किन-किन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है?
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ड्यूटी पर तैनात लापरवाह कार्मिकों के खिलाफ अब तक क्या विभागीय या कानूनी कार्रवाई की गई है?
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जेलों में बंद कैदियों के मानवाधिकारों, स्वास्थ्य और कल्याण (Inmate Welfare) को सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
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खराब पड़े सीसीटीवी कैमरों और निष्क्रिय पड़े जैमर्स को आधुनिक तकनीक से बदलने की क्या योजना है?
28 जुलाई को होगी अगली निर्णायक सुनवाई
माननीय हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वे इन सभी कड़े सवालों के तथ्यात्मक जवाब और सुधारात्मक कदमों की विस्तृत रिपोर्ट के साथ अगली सुनवाई में कोर्ट के समक्ष उपस्थित हों। इस मामले की अगली सुनवाई अब 28 जुलाई को निर्धारित की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जेल सुरक्षा व्यवस्था, कैदियों के प्रबंधन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े इस बड़े मामले में 28 जुलाई को सरकार की रिपोर्ट देखने के बाद हाईकोर्ट कड़े और दिशा-निर्देशक आदेश जारी कर सकता है।
Matribhumisamachar


