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झारखंड: अंगीभूत महाविद्यालयों से इंटर की पढ़ाई हटने के बाद शिक्षक और कर्मचारी सड़क पर, 2 महीने से मानदेय बंद

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रांची । गुरुवार, 2 जुलाई 2026

झारखंड सरकार द्वारा राज्य के अंगीभूत महाविद्यालयों (Constituent Colleges) में संचालित इंटरमीडिएट (11वीं और 12वीं) की पढ़ाई को चरणबद्ध तरीके से प्लस-टू (+2) उच्च विद्यालयों में स्थानांतरित (शिफ्ट) किए जाने के फैसले ने एक नया प्रशासनिक और मानवीय संकट खड़ा कर दिया है। सरकार के इस कदम से जहां छात्रों का दाखिला अब प्लस-टू स्कूलों में हो रहा है, वहीं पिछले कई दशकों से इन कॉलेजों में अपनी सेवाएं दे रहे हजारों संविदा व अनुबंधित शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों का भविष्य पूरी तरह अधर में लटक गया है।

राज्य के 65 अंगीभूत महाविद्यालयों में कार्यरत यह वर्कफोर्स इस समय गंभीर आर्थिक और मानसिक तनाव से गुजर रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिक्षा विभाग की ओर से इनके ‘समायोजन’ (Adjustment) को लेकर अब तक कोई भी नीतिगत गाइडलाइन जारी नहीं की गई है।

2 महीने से मानदेय बंद: परिवारों के सामने भुखमरी की नौबत

इस बदलाव का सबसे तात्कालिक और क्रूर असर इन कर्मचारियों की जेब पर पड़ा है। प्रभावित शिक्षकों और कर्मचारियों को पिछले दो महीनों से मानदेय का भुगतान नहीं किया गया है। गौरतलब है कि इन कर्मियों को पहले से ही बेहद आजीविका-असंगत (न्यूनतम) मानदेय दिया जा रहा था:

  • इंटरमीडिएट शिक्षक: लगभग ₹12,000 प्रति माह

  • तृतीय वर्गीय कर्मचारी (Clerical Staff): ₹8,000 प्रति माह

  • चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी (Peon/Lab Attendant): मात्र ₹6,000 प्रति माह

आज के महंगाई के दौर में इतनी कम राशि भी पिछले दो महीने से रुक जाने के कारण कर्मचारियों के घरों में राशन और बच्चों की पढ़ाई का संकट खड़ा हो गया है। कई चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों के परिवारों में भुखमरी जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है।

मुख्यमंत्री और मंत्रियों के आश्वासनों का धरातल पर नतीजा शून्य

अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत शिक्षक और कर्मचारी लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) को कई पत्र भेजे, सोशल मीडिया (X और फेसबुक) पर डिजिटल कैंपेन चलाए और स्थानीय विधायकों-मंत्रियों से भी गुहार लगाई।

हाल ही में सरकार के मंत्री रामदास सोरेन ने एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान भरोसा दिलाया था कि सरकार उनके समायोजन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर रही है। खुद मुख्यमंत्री ने भी पूर्व में सार्वजनिक मंचों से यह वादा किया था कि इस नीतिगत बदलाव के कारण राज्य के किसी भी शिक्षक या कर्मचारी को बेरोजगार नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन आश्वासनों के महीनों बाद भी शिक्षा विभाग की ओर से समायोजन की फाइल एक इंच आगे नहीं बढ़ी है।

करोड़ों की बचत पर शिक्षा विभाग मौन: वित्तीय विसंगति के आरोप

आंदोलनकारी कर्मचारी संघों ने कॉलेजों और उच्च शिक्षा विभाग पर एक बेहद गंभीर आरोप भी लगाया है। कर्मचारियों का कहना है कि:

“सालों तक योग्यता के बावजूद हमसे बेहद कम मानदेय (₹6,000 से ₹12,000) पर काम कराया गया। यदि नियमों के अनुसार पूर्ण वेतन दिया जाता तो सरकार पर भारी वित्तीय बोझ आता। हमारे इस त्याग की वजह से इन शिक्षण संस्थानों और सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये के राजस्व की बचत हुई है।”

अब सवाल यह उठ रहा है कि इन महाविद्यालयों के पास जो संसाधन और बजटीय फंड्स बचे हुए हैं, उनका उपयोग कहां किया जा रहा है? इस वित्तीय विसंगति को लेकर उच्च स्तर पर शिकायतें भी दर्ज कराई गई हैं, लेकिन शिक्षा विभाग ने अब तक इस पर कोई आंतरिक जांच या स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है।

शीघ्र समायोजन ही एकमात्र रास्ता

झारखंड के इन प्रभावित परिवारों की उम्मीदें अब पूरी तरह से राज्य सरकार के आखिरी फैसले पर टिकी हैं। कर्मचारियों की मांग स्पष्ट है: सरकार अविलंब एक विशेष कैबिनेट प्रस्ताव लाकर इन अनुभवी शिक्षकों को प्लस-टू स्कूलों में खाली पड़े पदों पर और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को अन्य सरकारी विभागों में रिक्तियों के आधार पर समायोजित करे।

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