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भारत का बड़ा कदम: अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला खारिज, किशनगंगा और रतले प्रोजेक्ट पर पाकिस्तान को करारा जवाब

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किशनगंगा जलविद्युत परियोजना का बांध और पावर हाउस।

नई दिल्ली. किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर हेग स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) द्वारा दिए गए हालिया ‘पूरक निर्णय’ (Supplemental Award) को भारत सरकार ने सख्त शब्दों में खारिज कर दिया है। 3 फरवरी 2026 की स्थिति के अनुसार भारत ने स्पष्ट किया है कि वह इस पूरी मध्यस्थता प्रक्रिया को ही “अवैध” मानता है और किसी भी आदेश का पालन नहीं करेगा।

यह विवाद सिंधु जल संधि (1960) के तहत चल रही कानूनी प्रक्रिया, आतंकवाद के मुद्दे और भारत की संप्रभुता से सीधे जुड़ा हुआ है।

समानांतर प्रक्रिया पर भारत की कड़ी आपत्ति

सिंधु जल संधि के अंतर्गत जल विवाद सुलझाने के लिए तीन स्पष्ट चरण तय किए गए हैं—

  1. स्थायी सिंधु आयोग
  2. तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert)
  3. मध्यस्थता अदालत (Arbitration)

भारत का कहना है कि संधि के अनुसार एक ही विवाद पर एक साथ दो मंचों पर सुनवाई नहीं हो सकती। भारत ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने पहले तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया शुरू कराई और बाद में उसे बदलकर सीधे मध्यस्थता अदालत में ले गया, जो संधि के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है।

इसी आधार पर भारत का तर्क है कि PCA की कार्यवाही कानूनी रूप से अमान्य है।

सिंधु जल संधि को ‘Abeyance’ में रखने का फैसला

भारत ने हाल ही में एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाते हुए सिंधु जल संधि को ‘स्थगन’ (Abeyance) में रखा है।
सरकार का कहना है कि अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सुरक्षा हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।

भारत का स्पष्ट संदेश है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह नहीं रोकता, तब तक संधि के तहत दायित्व निभाने की बाध्यता नहीं बनती। भारत यह भी दोहरा चुका है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय अदालत उसके संप्रभु अधिकारों पर फैसला नहीं कर सकती।

फरवरी 2026 का ताजा विवाद: ‘पॉन्डेज लॉगबुक’ आदेश

हालिया पूरक निर्णय में PCA ने भारत को बगलीहार और किशनगंगा परियोजनाओं से जुड़ी ‘पॉन्डेज लॉगबुक’ (ऑपरेशनल डेटा) सौंपने का निर्देश दिया था।

इस पर विदेश मंत्रालय (MEA) ने 2 फरवरी 2026 को दो टूक जवाब दिया कि भारत इस ट्रिब्यूनल को मान्यता नहीं देता, इसलिए किसी भी तरह की जानकारी साझा नहीं की जाएगी।
भारत ने इसे अदालत का ‘अति-विस्तार’ (Overreach) करार दिया है।

परियोजनाओं पर काम जारी, भारत अपने रुख पर कायम

भारत सरकार ने साफ किया है कि वह इन परियोजनाओं को संधि के तकनीकी मानकों के अनुरूप मानता है और काम निर्बाध रूप से जारी रहेगा—

  • किशनगंगा जलविद्युत परियोजना – 330 मेगावाट
  • रतले जलविद्युत परियोजना – 850 मेगावाट
  • बगलीहार जलविद्युत परियोजना – पहले ही तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया से गुजर चुकी

भारत का दावा है कि इन परियोजनाओं से पाकिस्तान को कोई वास्तविक नुकसान नहीं होता और वह केवल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा ले रहा है।

भारत के रुख का व्यापक असर

कूटनीतिक स्तर पर, भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते”
रणनीतिक रूप से, यह संदेश दिया गया है कि आतंकवाद और जल-साझाकरण अब अलग-अलग मुद्दे नहीं रहेंगे।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर, भारत यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि पाकिस्तान संस्थाओं का उपयोग जवाबदेही से बचने के लिए कर रहा है।

फरवरी 2026 में किशनगंगा–रतले विवाद पर भारत का रुख पहले से कहीं अधिक कठोर और स्पष्ट है। PCA के पूरक निर्णय को नकारते हुए भारत ने संप्रभुता, सुरक्षा और संधि-प्रक्रिया को सर्वोपरि रखा है। आने वाले समय में यह विवाद भारत–पाक जल कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून दोनों के लिए नज़ीर साबित हो सकता है।

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