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गोवा मतदाता सूची विवाद: क्या चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर मतदाता अधिकारों से ऊपर है? बॉम्बे हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
6 Min Read

पणजी।

गोवा के सैंता क्रूज़ (Santa Cruz) विधानसभा क्षेत्र से सामने आया एक मामला अब केवल छह मतदाताओं का नहीं, बल्कि भारत की संपूर्ण निर्वाचन और प्रशासनिक प्रणाली में तकनीकी निर्भरता बनाम वैधानिक अधिकारों का बड़ा मुद्दा बन चुका है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान एक ही परिवार के छह सदस्यों के नाम अंतिम मतदाता सूची से गायब होने के बाद यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ।

माननीय न्यायमूर्ति एम. एस. जमसांदकर और न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस की पीठ ने इस पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग (Election Commission of India) के ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर और ईआरओ (Electoral Registration Officer) के प्रशासनिक अधिकारों पर सख्त मौखिक टिप्पणियां की हैं।

 

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Form 8 की स्वीकृति के बाद भी नाम गायब: क्या है पूरा विवाद?

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, परिवार ने निवास स्थान बदलने के कारण नए पते पर नाम दर्ज कराने के लिए समय पर Form 8 जमा किया था। उनका आवेदन प्रशासनिक तौर पर स्वीकार किए जाने के बावजूद अंतिम मतदाता सूची में उनके नाम शामिल नहीं किए गए।

जब परिवार ने इस त्रुटि पर संपर्क किया, तो अधिकारियों ने उन्हें Form 6 भरने की सलाह दी।

 

Form 6 और Form 8 का कानूनी अंतर

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  • Form 6: यह केवल पहली बार पंजीकरण कराने वाले नए मतदाताओं (New Voters) के लिए होता है।
  • Form 8: इसका उपयोग पते में परिवर्तन, प्रविष्टियों के सुधार या वोटर आईडी में बदलाव के लिए किया जाता है।

परिवार ने Form 6 भरने से इनकार कर दिया क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें यह झूठी कानूनी घोषणा करनी पड़ती कि वे देश में पहली बार मतदाता बन रहे हैं, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act, 1950) का उल्लंघन होता।

 

‘सॉफ्टवेयर कानून से बड़ा नहीं हो सकता‘: बॉम्बे हाईकोर्ट का कड़ा रुख

सुनवाई के दौरान अदालत ने डिजिटल सॉफ्टवेयर प्रक्रिया की सीमाओं और अधिकारियों की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल उठाए:

  1. ईआरओ के स्वतंत्र निर्णय की शक्ति: अदालत ने पूछा कि यदि चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर किसी फॉर्म को तकनीकी खामियों के कारण खारिज करता है, तो क्या इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) के पास अपनी न्यायिक बुद्धि और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं बचता?
  2. सॉफ्टवेयर बनाम कानून: पीठ ने स्पष्ट टिप्पणी की कि निर्वाचन प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए बनाया गया प्रशासनिक सॉफ्टवेयर देश के वैधानिक कानूनों और नियमों पर हावी नहीं हो सकता।
  3. मताधिकार का दोहरा नुकसान: कोर्ट ने चिंता जताई कि यदि कोई नागरिक पुराने पते से हटा दिया जाता है और सॉफ्टवेयर त्रुटि के कारण नए पते पर पंजीकृत नहीं हो पाता, तो वह बिना किसी गलती के पूर्ण रूप से अपने मताधिकार से वंचित हो जाता है।

 

Election Commission का तर्क और पक्ष

चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि SIR प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट रोल जारी होने के बाद दावों और आपत्तियों (Claims and Objections) की एक प्रक्रिया उपलब्ध कराई जाती है।

  • आयोग का कहना था कि केवल एन्युमरेशन फॉर्म (enumeration form) जमा न करने से कोई पात्र नागरिक हमेशा के लिए सूची से बाहर नहीं होता।
  • प्रभावित व्यक्ति आवश्यक एड्रेस प्रूफ के साथ दावे के रूप में फिर से आवेदन कर सकते हैं।
  • आयोग के अनुसार, गोवा में ऐसे अन्य 97 मामलों को भी चिन्हित कर प्रक्रियात्मक सुधार के तहत जांचा जा रहा है।

मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।

 

Relevant Resource Links

 

Frequently Asked Questions (FAQ)

Q1: Form 6 और Form 8 में क्या मुख्य अंतर है?

Ans: Form 6 केवल पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिकों (New Voters) के लिए होता है। जबकि Form 8 का उपयोग पहले से पंजीकृत मतदाताओं द्वारा अपने पते में बदलाव या विवरण सुधारने के लिए किया जाता है।

Q2: SIR (Special Intensive Revision) क्या है?

Ans: यह चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों को अद्यतन करने, दोहरे नामों को हटाने और पते के सत्यापन के लिए चलाया जाने वाला एक विशेष गहन संशोधन अभियान है।

Q3: यदि मतदाता सूची से नाम गायब हो जाए तो क्या करना चाहिए?

Ans: नागरिक चुनाव आयोग द्वारा घोषित ‘Claims and Objections’ अवधि के दौरान संबंधित ERO/BLO के पास वैध निवास प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर अपना नाम वापस जुड़वाने का दावा पेश कर सकते हैं।

 

Disclaimer

यह लेख बॉम्बे हाईकोर्ट (गोवा पीठ) में जारी प्रक्रियात्मक सुनवाई और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। अदालत द्वारा सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियां अंतिम कानूनी निर्णय नहीं हैं। अंतिम निर्णय न्यायालय के अंतिम आदेश के अधीन रहेगा।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।