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स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड: 15 साल बाद माओवादी नेता ‘आजाद’ साक्ष्यों के अभाव में बरी, अदालत ने कहा—’संदेह सबूत का विकल्प नहीं’

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स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड में माओवादी नेता आजाद के बरी होने के बाद ओडिशा की विशेष अदालत और कानूनी साक्ष्यों का विवरण।
भुवनेश्वर । बुधवार, 19 अगस्त 2026
वर्ष 2008 के चर्चित वीएचपी (VHP) नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार सहयोगियों की हत्या के मामले में एक ऐतिहासिक न्यायिक फैसला सामने आया है। ओडिशा के गजपति जिले की विशेष अदालत (पारलाखेमुंडी) ने प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के प्रमुख नेता डी. केशब राव उर्फ ‘आजाद’ (Dunna Kesava Rao) को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ हत्या और साजिश में शामिल होने का अपराध ‘संदेह से परे’ साबित करने में पूरी तरह से विफल रहा।
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद आजाद को भुवनेश्वर की झारपड़ा विशेष जेल से रिहा कर दिया गया है। वह पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से बतौर अंडरट्रायल कैदी जेल में बंद था।

23 अगस्त 2008: कांड जिसने दहला दिया था कंधमाल

23 अगस्त 2008 की रात कंधमाल जिले के जलेसपाटा स्थित कन्या आश्रम में जब जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जा रहा था, तब 15 से 25 नकाबपोश और हथियारबंद हमलावरों ने परिसर पर धावा बोल दिया था। इस हमले में 84 वर्षीय स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती, एक साध्वी और उनके तीन अन्य सहयोगियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद कंधमाल में व्यापक सांप्रदायिक तनाव और हिंसा फैल गई थी।
उड़ीसा पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मामले की जांच की और माओवादी नेताओं पर साजिश रचने का आरोप लगाया था।

विशेष अदालत ने आजाद को बरी क्यों किया?

विशेष अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सत्यनारायण पात्रा ने 40 से अधिक पृष्ठों के अपने फैसले में अभियोजन पक्ष (Prosecution) के साक्ष्यों में भारी खामियां पाईं। बरी किए जाने के 5 मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:
  1. प्रत्यक्षदर्शियों की पहचान में अनिश्चितता: घटना के समय हमलावरों ने अपने चेहरे मंकी कैप और गमछे से ढक रखे थे। केवल एक गवाह ने आजाद को पहचानने का दावा किया था, लेकिन शुरुआती पुलिस बयान में चेहरे ढके होने की बात दर्ज थी, जिसके कारण कोर्ट ने इस गवाही को असुरक्षित माना।
  2. फोरेंसिक व बैलिस्टिक सबूतों का अभाव: आरोपी आजाद के पास से कोई हथियार, कारतूस या आपत्तिजनक सामान बरामद नहीं हुआ था। जो हथियार अन्य आरोपियों से मिले थे, उनसे आजाद को जोड़ने वाला कोई वैज्ञानिक या फोरेंसिक साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
  3. माओवादी पत्र का कोई फोरेंसिक मिलान नहीं: घटनास्थल से “बांसधरा डिवीज़न माओवादी कमिटी” के नाम से एक पत्र मिला था, जिस पर ‘आजाद’ के हस्ताक्षर थे। लेकिन अभियोजन पक्ष ने हैंडराइटिंग एक्सपर्ट (हस्तलेखन विशेषज्ञ) की रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत नहीं की, जिससे यह साबित नहीं हो सका कि पत्र आजाद का ही था।
  4. साजिश का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं: कोर्ट ने पाया कि आजाद द्वारा अन्य सह-आरोपियों के साथ बैठक करने या किसी आपराधिक साजिश में भाग लेने का कोई परिस्थितिजन्य या सीधा सबूत नहीं मिला।
  5. न्यायिक सिद्धांत: अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में टिप्पणी की: “संदेह, चाहे वह कितना भी गहरा या मजबूत क्यों न हो, कभी भी सबूत का स्थान नहीं ले सकता। अपराध चाहे कितना भी जघन्य हो, अदालत महज आशंका के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती।”

49 मामलों में नाम, 15 साल की कैद के बाद सभी केस से मुक्त

आजाद (D. Keshava Rao) ने मई 2011 में आंध्र प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था, जिसके बाद ओडिशा पुलिस ने उसे कस्टडी में लिया था। उसके खिलाफ ओडिशा और आंध्र प्रदेश में कुल 49 मामले दर्ज थे (जिसमें नायागढ़ शस्त्रागार हमला और जेल ब्रेक केस शामिल हैं)।
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के निर्देश पर पारलाखेमुंडी में गठित विशेष अदालत ने उसके मुकदमों का त्वरित निपटारा किया। स्वामी लक्ष्मणानंद हत्याकांड आजाद के खिलाफ अंतिम लंबित मामला था, जिसमें बरी होते ही उसके सभी 49 मामले समाप्त हो गए और वह 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जेल से बाहर आया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या कब और कहाँ हुई थी?
उत्तर: उनकी हत्या 23 अगस्त 2008 को ओडिशा के कंधमाल जिले के जलेसपाटा कन्या आश्रम में हुई थी।
Q2: अदालत ने माओवादी नेता आजाद को क्यों बरी किया?
उत्तर: अदालत ने साक्ष्यों और स्वतंत्र गवाहों की कमी, फोरेंसिक रिपोर्ट के अभाव तथा हस्तलेखन विशेषज्ञ की पुष्टि न होने के कारण आजाद को “संदेह का लाभ” देते हुए बरी किया।
Q3: आजाद कितने वर्षों तक जेल में बंद रहा?
उत्तर: आजाद मई 2011 से जेल में था और उसने लगभग 15 वर्षों तक अंडरट्रायल कैदी के रूप में समय बिताया।
Q4: इस मामले की जांच किस एजेंसी ने की थी?
उत्तर: इस हत्याकांड की जांच ओडिशा पुलिस की क्राइम ब्रांच (Crime Branch) ने की थी।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख विशेष अदालत द्वारा दिए गए आधिकारिक फैसले, पुलिस जांच रिपोर्ट और विश्वसनीय मीडिया स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल जनहित में निष्पक्ष कानूनी व पत्रकारितात्मक जानकारी प्रदान करना है।
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