भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जन्म 1889 में हुआ था। उनका बचपन किसी सामान्य भारतीय बच्चे जैसा नहीं था। परिवार, परिवेश और शिक्षा—तीनों ही स्तरों पर उनका अनुभव विशिष्ट रहा।
बचपन का अकेलापन: व्यक्तित्व निर्माण की पहली सीढ़ी
नेहरू अपनी दोनों बहनों—विजयालक्ष्मी पंडित और कृष्णा हठीसिंह—से उम्र में काफी बड़े थे। बहनें छोटी होने के कारण उनके बचपन में कोई समवयस्क साथी नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि उनका बचपन का एक लंबा समय अकेलेपन में बीता।
वयस्कों के बीच पला-बढ़ा बचपन
नेहरू का अधिकांश समय बच्चों के साथ खेलने में नहीं, बल्कि अपने पिता मोतीलाल नेहरू के मित्रों, राजनीतिक चर्चाओं और घर के कर्मचारियों के बीच गुज़रा।
कल्पनाशीलता और अंतर्मुखी स्वभाव
अकेलेपन ने नेहरू को अंतर्मुखी बनाया। वे अपनी ही कल्पनाओं, पुस्तकों और विचारों की दुनिया में रहने लगे। यही कल्पनाशीलता आगे चलकर उनके लेखन की शक्ति बनी। इतिहास, सभ्यता और भारत की आत्मा को समझने की यह यात्रा उनकी प्रसिद्ध पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
“मैं एक अजीब सा मिश्रण बन गया हूँ—पूर्व और पश्चिम का, जो कहीं भी पूरी तरह घर जैसा महसूस नहीं करता।”
— जवाहरलाल नेहरू
यह कथन उनके बचपन की मानसिक और सांस्कृतिक दुविधा को गहराई से व्यक्त करता है।
घर पर शिक्षा (Home Schooling): विशिष्ट बौद्धिक आधार
मोतीलाल नेहरू ने अपने इकलौते पुत्र की शिक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने नेहरू को किसी सामान्य स्कूल में भेजने के बजाय घर पर ही श्रेष्ठ निजी शिक्षकों से शिक्षा दिलवाई।
फर्डिनेंड टी. ब्रुक्स का प्रभाव
नेहरू के जीवन में सबसे प्रभावशाली शिक्षक फर्डिनेंड टी. ब्रुक्स रहे। उन्होंने नेहरू में अंग्रेज़ी साहित्य के प्रति गहरा प्रेम विकसित किया। शेक्सपियर, मिल्टन और यूरोपीय दर्शन के माध्यम से नेहरू ने विश्व को देखने का एक आधुनिक दृष्टिकोण अपनाया। इसी पश्चिमी बौद्धिक चश्मे से उन्होंने भारत और भारतीय संस्कृति को समझने की कोशिश की।
बहुभाषी शिक्षा, पर संस्कृत से दूरी
घर पर पढ़ाई के दौरान नेहरू ने हिंदी, उर्दू और संस्कृत की शिक्षा भी ली। हालांकि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि संस्कृत पढ़ने में उनकी विशेष रुचि नहीं थी। इसके बावजूद भारतीय दर्शन और परंपराओं की समझ उन्हें इतिहास और अनुवादित ग्रंथों के माध्यम से मिलती रही।
एकांत से नेतृत्व तक की यात्रा
जवाहरलाल नेहरू का बचपन भले ही एकाकी रहा हो, लेकिन वयस्कों का सान्निध्य, घर पर मिली विशिष्ट शिक्षा और कल्पनाशील मन—इन सबने मिलकर एक ऐसे नेता को गढ़ा जिसने आधुनिक, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक भारत की वैचारिक नींव रखी।
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