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धार भोजशाला: ASI की वैज्ञानिक रिपोर्ट ने खोला इतिहास का पन्ना, क्या यह वाक़ई ‘शारदा सदन’ था?

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धार भोजशाला में मिले प्राचीन मंदिर के स्तंभ और शिलालेखों की तस्वीर।

भोपाल ।  बुधवार, 6 मई 2026

धार की ऐतिहासिक भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रहे दशकों पुराने विवाद में अब पुरातात्विक साक्ष्यों की निर्णायक एंट्री हो गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इंदौर हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश कर दी है, जो न केवल वर्तमान ढांचे की बनावट पर सवाल उठाती है, बल्कि इसके गौरवशाली अतीत की कड़ियों को भी जोड़ती है।

परमार काल का वैभव और ‘शारदा सदन’ का अस्तित्व

ASI की रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गई है कि वर्तमान में जो मस्जिद का ढांचा दिखाई देता है, वह असल में 10वीं-11वीं शताब्दी के हिंदू मंदिरों के अवशेषों पर खड़ा किया गया है।

  • तीन स्तरीय निर्माण: सर्वे में पाया गया कि सबसे आधारभूत हिस्सा ईंटों और मिट्टी का है। उसके ऊपर राजा भोज और अन्य परमार शासकों ने विशाल पत्थरों से एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

  • शिक्षा का केंद्र: ऐतिहासिक दस्तावेजों और वहां मिले शिलालेखों से यह पुष्टि होती है कि इसे ‘शारदा सदन’ (विद्या की देवी सरस्वती का मंदिर) के रूप में जाना जाता था, जहाँ संस्कृत व्याकरण और महान ग्रंथों की रचना होती थी।

स्तंभों और मूर्तियों की दास्तां

रिपोर्ट में आंकड़ों के साथ बताया गया है कि इस ढांचे में 106 खंभे और 82 वॉल-पिलर्स ऐसे हैं, जो स्पष्ट रूप से हिंदू मंदिर वास्तुकला शैली के हैं।

“सर्वेक्षण के दौरान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव जैसे देवताओं की मूर्तियों के टुकड़े मिले हैं। इन मूर्तियों को या तो छैनी से घिसा गया है या फिर इन्हें निर्माण सामग्री की तरह इस्तेमाल करने के लिए बेरहमी से काटा गया है।” — ASI रिपोर्ट अंश

क्या इतिहास मिटाने की कोशिश हुई?

ASI ने अपनी जांच में यह भी स्पष्ट किया है कि मंदिर को मस्जिद में तब्दील करने का काम बहुत जल्दबाजी में किया गया था। इसकी पुष्टि वहां मिले महमूद शाह खिलजी के दौर के एक शिलालेख से होती है, जिसमें मंदिर को नष्ट कर मस्जिद बनाने का जिक्र है। पश्चिमी दीवार की मेहराब भी किसी पुराने आधार (Basalt platform) पर जबरन बनाई गई प्रतीत होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, वहां रहने वाले मूल निवासी संस्कृत भाषा और नागरी लिपि का प्रयोग करते थे, जबकि अरबी और फारसी के प्रमाण बहुत बाद के कालखंड के हैं।

हाईकोर्ट की भूमिका और भविष्य

इस रिपोर्ट के आने के बाद अब गेंद इंदौर हाईकोर्ट के पाले में है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक साक्ष्य (जैसे GPR सर्वे और कार्बन डेटिंग के अनुमान) इस केस की दिशा बदल सकते हैं। मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों के बीच, ASI ने अपनी निष्पक्षता और वैज्ञानिक पद्धति पर जोर दिया है।

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