भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को अक्सर आधुनिकीकरण, रेलवे, प्रशासनिक ढाँचे और वैश्विक व्यापार से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन गहराई से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह तथाकथित विकास वास्तव में भारत के संसाधनों के व्यवस्थित दोहन और आर्थिक विनाश की प्रक्रिया थी।
अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक के विस्तृत शोध और लेखक-राजनेता शशि थरूर जैसे विचारकों के अनुसार, ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से निकाली गई संपदा आज के मूल्य पर लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर के बराबर थी। यह इतिहास की सबसे बड़ी औपनिवेशिक आर्थिक लूटों में से एक मानी जाती है।
1️⃣ 45 ट्रिलियन डॉलर की लूट: एक सुनियोजित औपनिवेशिक व्यवस्था
यह लूट केवल सीधे करों तक सीमित नहीं थी, बल्कि एक चतुर और संरचित व्यापार तंत्र के माध्यम से अंजाम दी गई।
🔹 टैक्स और व्यापार का षड्यंत्र
ब्रिटिश सरकार भारतीय किसानों और व्यापारियों से भारी भूमि-कर और अन्य कर वसूलती थी। उसी कर राशि का उपयोग कर भारत से कपास, अफीम, मसाले और अन्य वस्तुएँ खरीदी जाती थीं।
अर्थात—
भारत का माल, भारत के ही पैसे से, ब्रिटेन के लिए खरीदा गया।
🔹 ‘होम चार्जेस’ और विदेशी मुद्रा की निकासी
भारत से होने वाले निर्यात से प्राप्त सोना और विदेशी मुद्रा भारत के खजाने में जमा न होकर सीधे लंदन स्थित ‘होम चार्जेस’ खाते में चली जाती थी। इसमें ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, सेना का खर्च और प्रशासनिक लागत शामिल थी—जिसका पूरा बोझ भारत उठाता था।
2️⃣ रेलवे: विकास का प्रतीक या शोषण का औजार?
यह दावा आम है कि “अंग्रेजों ने भारत को रेलवे दी”, लेकिन इसका उद्देश्य भारतीय जनकल्याण नहीं था।
🔹 सैन्य नियंत्रण और कच्चे माल की ढुलाई
रेलवे का प्रमुख उद्देश्य था—
- आंतरिक इलाकों से कच्चा माल बंदरगाहों तक पहुँचाना
- किसी भी विद्रोह की स्थिति में ब्रिटिश सेना की त्वरित तैनाती
🔹 भारतीय पैसे से ब्रिटिश मुनाफा
रेलवे परियोजनाओं में ब्रिटिश निवेशकों को 5% निश्चित मुनाफे की गारंटी दी गई, चाहे परियोजना लाभ में हो या घाटे में। यह गारंटी भारतीय करदाताओं के पैसे से चुकाई जाती थी। इसे कई इतिहासकार औपनिवेशिक काल का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला मानते हैं।
🔹 सामाजिक भेदभाव
तीसरे दर्जे के डिब्बों में भारतीय यात्रियों को अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था, जबकि पूरी व्यवस्था का आर्थिक बोझ भारत पर था।
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3️⃣ भारत का औद्योगिक पतन (De-industrialization)
18वीं सदी की शुरुआत में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी लगभग 24% थी। 1947 में स्वतंत्रता के समय यह घटकर 4% से भी कम रह गई।
🔹 कपड़ा उद्योग का सुनियोजित विनाश
ढाका की मलमल और भारतीय सूती वस्त्र विश्व-प्रसिद्ध थे। ब्रिटिश नीतियों के तहत—
- भारतीय बुनकरों पर भारी कर लगाए गए
- मैनचेस्टर की मिलों का कपड़ा भारतीय बाजार में थोपा गया
इसका परिणाम यह हुआ कि लाखों कारीगर बेरोजगार हो गए और पारंपरिक उद्योग नष्ट हो गए।
🔹 कृषि का जबरन व्यवसायीकरण
किसानों को खाद्यान्न के बजाय नील और अफीम जैसी नकदी फसलें उगाने के लिए मजबूर किया गया। इससे खाद्य सुरक्षा कमजोर हुई और भारत में बार-बार भीषण अकाल पड़े।
4️⃣ अकाल और मानवीय त्रासदी
ब्रिटिश नीतियों का सबसे भयावह परिणाम अकालों के रूप में सामने आया।
1943 का बंगाल अकाल के दौरान लाखों लोगों की मृत्यु हुई, जबकि उसी समय भारत से अनाज का निर्यात जारी रहा। यह अकाल प्राकृतिक नहीं, बल्कि नीति-जनित त्रासदी माना जाता है।
औपनिवेशिक ‘आधुनिकता’ का सच
ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित रेलवे, बंदरगाह और प्रशासनिक ढाँचा भारत के विकास के लिए नहीं, बल्कि औपनिवेशिक लूट को अधिक प्रभावी बनाने के लिए बनाया गया था।
आज जिन संस्थानों को औपनिवेशिक ‘उपहार’ कहा जाता है, वे वास्तव में उन संसाधनों के अवशेष हैं जिन्हें ब्रिटेन अपने साथ ले जाने में असफल रहा।
👉 यह इतिहास केवल अतीत की कथा नहीं, बल्कि यह समझने का माध्यम है कि औपनिवेशिक शोषण ने भारत की आर्थिक संरचना को कैसे दशकों पीछे धकेल दिया।
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