मुगल इतिहास में अकबर को प्रायः एक उदार, सहिष्णु और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष शासक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। विद्यालयी पुस्तकों से लेकर लोकप्रिय फिल्मों तक—अकबर की छवि एक ऐसे बादशाह की बनाई गई है जिसने धर्म से ऊपर उठकर शासन किया।
लेकिन आधुनिक इतिहास लेखन और स्रोतों के पुनर्पाठ से यह स्पष्ट होता है कि अकबर का व्यक्तित्व सरल नहीं, बल्कि गहरे विरोधाभासों से भरा हुआ था। उसे समझने के लिए उसकी नीतियों के विकासक्रम और उसके शासनकाल की कठोर घटनाओं को समान रूप से देखना आवश्यक है।
1️⃣ चित्तौड़गढ़ का नरसंहार (1568): अकबर के शासन का काला अध्याय
चित्तौड़गढ़ दुर्ग की घेराबंदी और पतन अकबर के “महान” होने के दावों पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
🔴 30,000 आम नागरिकों की हत्या
फरवरी 1568 में चित्तौड़गढ़ विजय के बाद अकबर ने किले के भीतर मौजूद लगभग 30,000 गैर-लड़ाकों—किसान, शिल्पकार और सामान्य नागरिकों—के नरसंहार का आदेश दिया।
यह कार्रवाई किसी सैन्य रणनीति का हिस्सा नहीं थी, बल्कि राजपूत प्रतिरोध को जड़ से समाप्त करने की प्रतिशोधात्मक नीति थी।
⚔️ ‘जिहाद’ का उद्घोष
विजय के पश्चात जारी फतहनामा में इस युद्ध को “काफिरों के खिलाफ जिहाद” बताया गया।
यह तथ्य उस उदार अकबर की छवि से बिल्कुल विपरीत है, जिसे बाद के वर्षों में सर्वधर्म समभाव का प्रतीक कहा गया।
इतिहासकारों के अनुसार, चित्तौड़गढ़ की घटना अकबर के प्रारंभिक शासनकाल की कट्टर और दमनकारी मानसिकता को उजागर करती है।
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2️⃣ धार्मिक नीतियाँ: सहिष्णुता या राजनीतिक विवशता?
अकबर की सुलह-ए-कुल नीति को अक्सर उसकी महानता का प्रमाण बताया जाता है, लेकिन इसके पीछे छिपे राजनीतिक कारणों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
◼️ प्रारंभिक धार्मिक कठोरता
शासन के शुरुआती वर्षों में अकबर एक पारंपरिक इस्लामी शासक की तरह व्यवहार करता था।
हालाँकि उसने जज़िया कर हटाया, लेकिन राजनीतिक दबावों और विद्रोहों के चलते इसे अस्थायी रूप से फिर लागू भी किया, जिसे अंततः 1579 में समाप्त किया गया।
◼️ दीन-ए-इलाही: धर्म नहीं, सत्ता का उपकरण
अकबर द्वारा शुरू किया गया दीन-ए-इलाही कोई संगठित धर्म नहीं था।
अधिकांश इतिहासकार इसे अकबर का प्रयास मानते हैं जिसमें वह स्वयं को आध्यात्मिक गुरु (पीर) के रूप में स्थापित कर उलेमाओं की शक्ति को कमजोर करना चाहता था।
इसका उद्देश्य धार्मिक सुधार से अधिक राजनीतिक नियंत्रण था।
◼️ राजपूत नीति: उदारता या मजबूरी?
राजपूत राजाओं से वैवाहिक संबंध और हिंदुओं को ऊँचे प्रशासनिक पद देना अकबर की उदारता से अधिक उसकी राजनीतिक आवश्यकता थी।
वह जानता था कि बहुसंख्यक हिंदू आबादी और शक्तिशाली राजपूतों के सहयोग के बिना भारत पर शासन असंभव है।
3️⃣ अकबर का व्यक्तित्व: तीन चरणों में विकास
| चरण | विशेषताएँ | प्रमुख घटनाएँ |
|---|---|---|
| प्रारंभिक (1556–1570) | विस्तारवादी, कट्टर | चित्तौड़गढ़ नरसंहार, जिहाद का उद्घोष |
| मध्य (1571–1580) | जिज्ञासु, संदेहशील | इबादतखाना, मज़हरनामा |
| उत्तरकाल (1581–1605) | व्यावहारिक संतुलन | सुलह-ए-कुल, प्रशासनिक सुधार |
अकबर — धर्मनिरपेक्ष नहीं, व्यावहारिक राजनीतिज्ञ
अकबर को केवल “महान” या “धर्मनिरपेक्ष” कह देना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा।
वह एक व्यावहारिक राजनीतिज्ञ (Pragmatic Politician) था, जिसने धर्म का उपयोग सत्ता को स्थिर और विस्तृत करने के लिए किया।
✔️ उसकी धार्मिक सहिष्णुता नैतिक आदर्श से अधिक राजनीतिक रणनीति थी।
✔️ चित्तौड़गढ़ जैसी घटनाएँ सिद्ध करती हैं कि सत्ता को चुनौती मिलने पर वह उतना ही कठोर और क्रूर हो सकता था जितने उससे पहले के आक्रांता।
👉 इसलिए अकबर को समझने के लिए आवश्यक है कि उसे पूरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, उपलब्ध स्रोतों और उसके शासन के सभी पक्षों के साथ देखा जाए—न कि केवल एक आदर्श छवि के रूप में।
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