शुक्रवार, सितंबर 18 2026 | 07:25:19 PM

पटना की सिन्हा लाइब्रेरी पर नीतीश सरकार को सुप्रीम कोर्ट का झटका: 1 रुपये का मुआवजा बना ‘मजाक’

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

पटना. देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने बिहार की राजधानी पटना में स्थित ऐतिहासिक ‘श्रीमती राधिका सिन्हा संस्थान और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी’ के अधिग्रहण मामले में नीतीश सरकार को बड़ा झटका दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार के 2015 के अधिग्रहण कानून को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है।

अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी ऐतिहासिक धरोहर का अधिग्रहण करने के लिए महज 1 रुपये का सांकेतिक मुआवजा देना “दिखावटी” और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

पटना हाईकोर्ट का फैसला पलटा, ट्रस्ट को मिलेगा अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पटना हाई कोर्ट के 2024 के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें राज्य सरकार द्वारा लाइब्रेरी के टेकओवर को सही ठहराया गया था। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि इस लाइब्रेरी का पूरा प्रबंधन और प्रशासन तुरंत मूल ट्रस्ट को वापस सौंपा जाए।

क्यों रद्द हुआ ‘अधिग्रहण एवं प्रबंधन अधिनियम, 2015’?

कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान बिहार सरकार की कार्यप्रणाली पर कई सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि:

  1. निष्पक्षता का अभाव: सरकार ने ट्रस्ट को अधिग्रहण से पहले कोई नोटिस नहीं दिया था।

  2. कोई ठोस कारण नहीं: अधिग्रहण से पहले ट्रस्ट पर कुप्रबंधन, वित्तीय अनियमितता या लापरवाही का कोई आरोप सिद्ध नहीं किया गया था।

  3. मुआवजे की विसंगति: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार का सम्मान होना चाहिए, और 1 रुपये का मुआवजा किसी भी तरह से “उचित” नहीं माना जा सकता।

डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा और लाइब्रेरी का गौरवशाली इतिहास

यह लाइब्रेरी केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि बिहार के बौद्धिक गौरव का प्रतीक है।

  • स्थापना: इसकी स्थापना 1924 में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी पत्नी राधिका सिन्हा की याद में की थी।

  • बौद्धिक केंद्र: डॉ. सिन्हा भारतीय संविधान सभा के प्रथम (अस्थायी) अध्यक्ष थे। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत पुस्तकों का विशाल संग्रह इस लाइब्रेरी को दान कर दिया था।

  • धरोहर: यहाँ दुर्लभ पांडुलिपियों और ब्रिटिश काल के महत्वपूर्ण दस्तावेजों का संग्रह है, जो शोधकर्ताओं के लिए किसी खजाने से कम नहीं है।

क्या होगा इस फैसले का असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा। यह स्पष्ट करता है कि राज्य सरकारें “सार्वजनिक हित” के नाम पर बिना किसी ठोस आधार या बिना उचित मुआवजे के निजी या ट्रस्ट की संपत्तियों पर कब्जा नहीं कर सकतीं।

कोर्ट की अहम टिप्पणी: “बिना प्रक्रिया का पालन किए और बिना पारदर्शी कारण बताए किसी संस्थान का अधिग्रहण करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।”

मुख्य बिंदु एक नजर में:

  • कानून का नाम: श्रीमती राधिका सिन्हा संस्थान और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी (अधिग्रहण एवं प्रबंधन) अधिनियम, 2015।

  • सुप्रीम कोर्ट का आदेश: कानून रद्द, प्रबंधन ट्रस्ट को वापस मिलेगा।

  • विवाद की जड़: मात्र 1 रुपये का मुआवजा और बिना नोटिस के अधिग्रहण।

matribhumisamachar.com/

Related Post

Share This Article
Follow:
लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।