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सर थॉमस रो और जहांगीर की मुलाकात: भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की आहट

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10 जनवरी 1616 का दिन भारत के राजनीतिक और व्यापारिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। इसी दिन ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम के आधिकारिक राजदूत के रूप में सर थॉमस रो ने अजमेर के किले में मुगल बादशाह जहांगीर के सामने अपना परिचय पत्र प्रस्तुत किया था। यह भारतीय इतिहास की एक युगांतकारी घटना है। जब सर थॉमस रो ने जहांगीर के दरबार में कदम रखा, तो शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि एक व्यापारिक अनुमति भविष्य में 200 वर्षों की गुलामी की नींव रखेगी।

मिशन का उद्देश्य: व्यापारिक एकाधिकार की तलाश

ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) भारत में व्यापार करने के लिए संघर्ष कर रही थी। इससे पहले 1608 में विलियम हॉकिन्स ने कोशिश की थी, लेकिन पुर्तगालियों के प्रभाव के कारण वह विफल रहा था। सर थॉमस रो का मुख्य लक्ष्य था:

  • मुगल साम्राज्य में अंग्रेजों के लिए व्यापारिक सुरक्षा प्राप्त करना।

  • सूरत और अन्य क्षेत्रों में फैक्ट्रियाँ (गोदाम) स्थापित करने की लिखित अनुमति लेना।

  • पुर्तगाली व्यापारियों के वर्चस्व को कम करना।

अजमेर के किले में शाही स्वागत

सर थॉमस रो सितंबर 1615 में सूरत बंदरगाह पर उतरे थे, लेकिन जहांगीर से मिलने के लिए उन्हें अजमेर की यात्रा करनी पड़ी। रो एक चतुर कूटनीतिज्ञ थे। उन्होंने मुगल दरबार के तौर-तरीकों को समझा और जहांगीर को रिझाने के लिए यूरोपीय उपहार (जैसे कीमती पेंटिंग्स, शराब और घड़ियाँ) भेंट कीं।

जहांगीर, जो कला और विदेशी वस्तुओं का शौकीन था, रो के व्यक्तित्व और शिष्टाचार से काफी प्रभावित हुआ। दोनों के बीच कई महीनों तक बातचीत का सिलसिला चला।

मुगल-ब्रिटिश संधि और प्राप्त अधिकार

काफी प्रयासों के बाद, सर थॉमस रो एक ‘शाही फरमान’ प्राप्त करने में सफल रहे। हालांकि जहांगीर ने अंग्रेजों को कोई विशेष जमीन नहीं दी, लेकिन उन्हें निम्नलिखित अधिकार मिले:

  • मुगल साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्र रूप से व्यापार करने की अनुमति।

  • सूरत में ब्रिटिश फैक्ट्री को स्थायी मान्यता।

  • व्यापारिक विवादों को हल करने के लिए कानूनी सुरक्षा।

सर थॉमस रो का कूटनीतिक दृष्टिकोण

रो ने अपनी डायरी और पत्रों में लिखा था कि अंग्रेजों को पुर्तगालियों की तरह किलाबंदी या युद्ध के बजाय ‘विशुद्ध व्यापार’ पर ध्यान देना चाहिए। उनका मानना था कि समुद्र पर नियंत्रण ही भारत में सफलता की कुंजी है। उनका यह कथन प्रसिद्ध है:

“यदि आप लाभ चाहते हैं, तो तलवार को व्यापार से दूर रखें।”

ऐतिहासिक महत्व: एक नए युग की शुरुआत

यह मुलाकात केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं थी, बल्कि भारत में ब्रिटिश शक्ति के उदय का पहला औपचारिक कदम था।

  • पुर्तगालियों का अंत: इससे भारत में पुर्तगाली प्रभुत्व खत्म होने लगा।

  • ईस्ट इंडिया कंपनी की जड़ें: सूरत के बाद मद्रास, बॉम्बे और कोलकाता में ब्रिटिश प्रभाव बढ़ता गया।

  • मुगल सत्ता का आकलन: रो ने अपनी टिप्पणियों में मुगल दरबार के वैभव के साथ-साथ उसकी आंतरिक कमजोरियों को भी भांप लिया था, जिसका लाभ आगे चलकर कंपनी ने उठाया।

सर थॉमस रो ने अपनी डायरी और पत्रों में जहांगीर और मुगल दरबार का जो वर्णन किया है, वह न केवल ऐतिहासिक है बल्कि उस समय की विलासिता और मुगल शासन की बारीकियों को भी दर्शाता है।

सर थॉमस रो ने अपने अनुभवों से जुड़ी कुछ सबसे रोचक बातें और जहांगीर के व्यक्तित्व पर अपनी डायरी में लिखा था

जहांगीर का विलासी और कला-प्रेमी व्यक्तित्व

रो ने लिखा है कि जहांगीर कला, विशेषकर पेंटिंग का जबरदस्त पारखी था।

  • कला की चुनौती: रो ने जहांगीर को इंग्लैंड से लाई हुई एक सुंदर पेंटिंग दिखाई। जहांगीर ने अपने दरबार के चित्रकारों से ठीक वैसी ही पाँच और पेंटिंग बनवा दीं। जब रो को उन्हें पहचानने के लिए कहा गया, तो वे भ्रमित हो गए। जहांगीर इससे बहुत खुश हुआ और अपनी कला की श्रेष्ठता पर गर्व किया।

  • रत्न और आभूषण: रो के अनुसार, जहांगीर रत्नों का इतना शौकीन था कि वह दुनिया के सबसे कीमती हीरों और मोतियों के बारे में घंटों बात कर सकता था।

 शराब और दावतें

रो ने अपनी डायरी में जहांगीर की शराब पीने की आदत का विस्तार से वर्णन किया है।

  • वे लिखते हैं कि रात के समय दरबार में अक्सर निजी महफिलों का आयोजन होता था, जहाँ सम्राट और उनके करीबी लोग विदेशी शराब का आनंद लेते थे। रो ने अक्सर जहांगीर को अच्छी यूरोपीय शराब (जैसे स्पैनिश वाइन) उपहार में दी थी, जिसे सम्राट बहुत पसंद करता था।

  • रो ने नोट किया कि नशे में होने के बावजूद, जहांगीर अक्सर दर्शन और धर्म के गहरे विषयों पर चर्चा करता था।

मुगल दरबार की शान और ‘नज़र’ (उपहार) परंपरा

रो मुगल दरबार के वैभव को देखकर चकित थे, लेकिन वे ‘उपहार’ देने की अनिवार्य परंपरा से थोड़ा परेशान भी थे।

  • उन्होंने लिखा कि मुगल दरबार में बिना किसी कीमती उपहार के प्रवेश करना लगभग असंभव था। जहांगीर को छोटी लेकिन अनोखी विदेशी चीजें पसंद थीं, जैसे कि अंग्रेजी नक्शे, कोच (सवारी वाली गाड़ी) और यहाँ तक कि अंग्रेजी शिकारी कुत्ते।

जहांगीर का स्वभाव: क्रूरता

रो ने जहांगीर को एक ‘विरोधाभासों वाला व्यक्ति’ बताया:

  • क्रूरता: उसी डायरी में वे ऐसी घटनाओं का भी जिक्र करते हैं जहाँ सम्राट ने मामूली अपराधों के लिए अपराधियों को हाथियों से कुचलने या भयानक दंड देने का आदेश दिया।

मुगल प्रशासन के प्रति रो की गुप्त राय

अपनी डायरी में रो ने केवल प्रशंसा ही नहीं की, बल्कि कुछ तीखी टिप्पणियाँ भी कीं:

  • उन्होंने मुगलों को “अत्यधिक अहंकारी” और “दिखावे का शौकीन” बताया।

  • उन्होंने चेतावनी दी थी कि मुगल सेना दिखने में बड़ी है, लेकिन अनुशासन और आधुनिक युद्ध कला में यूरोपीय सेनाओं से बहुत पीछे है। यह अवलोकन बाद में अंग्रेजों के लिए बहुत काम आया।

नूरजहां का प्रभाव

रो ने यह भी महसूस किया था कि दरबार में निर्णय लेने में सम्राट की पसंदीदा पत्नी नूरजहां का प्रभाव बहुत अधिक था। उन्होंने पाया कि सम्राट को प्रभावित करने के लिए नूरजहां के भाई आसफ खान को खुश रखना जरूरी था।

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