इस्लामाबाद. दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति में एक नया और खतरनाक मोड़ आता दिख रहा है। विशेषज्ञों और खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI (Inter-Services Intelligence) अब अफगानिस्तान में चीन के बढ़ते आर्थिक पदचिह्नों को अपनी ‘रणनीतिक गहराई’ (Strategic Depth) के लिए खतरे के रूप में देख रही है। इस पूरी बिसात का सबसे महत्वपूर्ण मोहरा बना है— वाखान कॉरिडोर (Wakhan Corridor)।
वाखान कॉरिडोर: क्यों है यह ‘रणनीतिक सोने की खान’?
अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्व में स्थित वाखान कॉरिडोर एक संकीर्ण भौगोलिक पट्टी है, जो सीधे चीन के शिनजियांग प्रांत से जुड़ती है।
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सीधा व्यापारिक मार्ग: यह गलियारा चीन को पाकिस्तान पर निर्भर रहे बिना सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच प्रदान करता है।
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कनेक्टिविटी: यदि यहाँ सड़क और ऊर्जा परियोजनाएं सफल होती हैं, तो यह क्षेत्र दक्षिण और मध्य एशिया के बीच ‘आर्थिक सेतु’ बन जाएगा।
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चीन की सुरक्षा: बीजिंग के लिए यह क्षेत्र उइघुर उग्रवाद को रोकने के लिए एक ‘बफर ज़ोन’ की तरह है।
ISI की चिंता: पाकिस्तान का घटता वर्चस्व?
दशकों से अफगानिस्तान के लिए समुद्री व्यापार का मुख्य मार्ग पाकिस्तान के कराची और ग्वादर बंदरगाह रहे हैं। लेकिन वाखान कॉरिडोर के सक्रिय होने से परिदृश्य बदल सकता है:
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ट्रांजिट कार्ड का कमजोर होना: यदि काबुल सीधे बीजिंग से जुड़ जाता है, तो पाकिस्तान का वह रणनीतिक दबाव खत्म हो जाएगा जो वह व्यापारिक मार्ग रोककर बनाता रहा है।
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CPEC का विस्तार बनाम नया मार्ग: चीन अब CPEC (China-Pakistan Economic Corridor) को अफगानिस्तान तक विस्तारित करने की बात कर रहा है, लेकिन वह वाखान के जरिए एक वैकल्पिक मार्ग भी सुरक्षित रखना चाहता है।
चीनी निवेश पर मंडराते खतरे: ISKP और ISI का कनेक्शन?
सुरक्षा विश्लेषकों का दावा है कि ISI उन आतंकी समूहों के साथ संपर्क साधने की कोशिश कर रही है जो चीनी परियोजनाओं को अस्थिर कर सकें।
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आतंक का हथियार: आशंका है कि वाखान कॉरिडोर में काम करने वाले चीनी इंजीनियरों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर चीन को डराने की कोशिश की जा सकती है।
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ISKP की भूमिका: ‘इस्लामिक स्टेट खुरासान’ (ISKP) पहले से ही तालिबान और चीन के हितों पर हमले कर रहा है। यदि इन उग्रवादी समूहों को बाहरी समर्थन मिलता है, तो पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था चरमरा सकती है।
तालिबान, चीन और पाकिस्तान: त्रिकोणीय तनाव
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार वर्तमान में एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
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तालिबान की मजबूरी: अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच तालिबान को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए चीनी निवेश की सख्त जरूरत है।
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चीन की कूटनीति: बीजिंग ‘चेकबुक डिप्लोमेसी’ के जरिए काबुल में अपनी पैठ मजबूत कर रहा है, जिससे इस्लामाबाद में बेचैनी बढ़ गई है।
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सीमा विवाद: हाल के महीनों में डूरंड रेखा पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सैन्य झड़पें बढ़ी हैं, जिसने इस त्रिकोणीय रिश्ते को और अधिक जटिल बना दिया है।
भविष्य का पूर्वानुमान: एशिया का नया पावर सेंटर
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले 5 वर्षों में वाखान कॉरिडोर एशिया की सुरक्षा राजनीति का मुख्य केंद्र होगा।
“अगर चीन वाखान के जरिए मध्य एशिया तक अपनी पहुंच पक्की कर लेता है, तो यह न केवल पाकिस्तान बल्कि भारत और अमेरिका जैसी वैश्विक शक्तियों के लिए भी नए समीकरण पैदा करेगा।”
अफगानिस्तान की धरती पर चल रही यह ‘रणनीतिक खींचतान’ केवल व्यापार के बारे में नहीं है, बल्कि यह इस बात का फैसला करेगी कि आने वाले समय में क्षेत्रीय सुपरपावर कौन होगा। क्या पाकिस्तान अपनी पारंपरिक स्थिति बचा पाएगा, या चीन का आर्थिक प्रभाव भूगोल की सीमाओं को बदल देगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
तालिबान और पाकिस्तान के बीच बढ़ता सीमा विवाद – मातृभूमि समाचार
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