लखनऊ. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जाति जन्म से निर्धारित होती है और धर्म परिवर्तन करने मात्र से किसी व्यक्ति की मूल जाति नहीं बदलती। हालांकि, न्यायालय ने यह भी साफ किया कि ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने के बाद व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) के लिए मिलने वाले आरक्षण के लाभ का हकदार नहीं रहेगा।
मामला क्या था?
यह निर्णय न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार की खंडपीठ ने एक दलित व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद अनुसूचित जाति (SC) के कोटे के तहत मिलने वाले लाभों और सुविधाओं की मांग की थी।
कोर्ट की 3 बड़ी टिप्पणियां:
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अमिट पहचान है जाति: खंडपीठ ने कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाति एक ‘अमिट पहचान’ है। धर्म बदलना एक व्यक्तिगत चुनाव है, लेकिन यह उस ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को नहीं मिटाता जिसमें व्यक्ति पैदा हुआ है।
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1950 का संवैधानिक आदेश: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत आरक्षण के लाभ केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक सीमित हैं। यदि कोई दलित व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है, तो वह कानूनी रूप से SC आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाता है।
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विधिक बनाम सामाजिक दर्जा: न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘जाति’ और ‘धर्म’ दो अलग अवधारणाएं हैं। विधिक रूप से जाति का दर्जा वही रहता है जो जन्म के समय था, लेकिन धर्म बदलने पर आरक्षण के लिए पात्रता समाप्त हो जाती है।
फैसले का दूरगामी प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उत्तर प्रदेश में जाति प्रमाण पत्र और आरक्षण से जुड़े विवादों को सुलझाने में एक ‘नजीर’ (Precedent) साबित होगा। इससे उन लोगों पर सीधा असर पड़ेगा जो धर्म परिवर्तन के बावजूद अपनी पुरानी जाति के आधार पर सरकारी सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं।
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