नई दिल्ली । सोमवार, 13 जुलाई 2026
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर किशोरों के आपसी सहमति से बने रिश्तों में पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के गलत इस्तेमाल पर बेहद गंभीर चिंता व्यक्त की है। जस्टिस बीवी नागरथना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि जब किशोर लड़कियां अपने पार्टनर्स के साथ परिवार की मर्जी के बिना शादी कर लेती हैं, तो माता-पिता अक्सर अपनी तथाकथित ‘इज्जत’ बचाने के लिए लड़के के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज करवा देते हैं।
अदालत ने तीखे लहजे में सवाल उठाया कि कोई भी राज्य किसी लड़के और लड़की को भागने से भला कैसे रोक सकता है? न्यायपालिका का मानना है कि पॉक्सो एक्ट का निर्माण बच्चों को यौन उत्पीड़न और शोषण से बचाने के लिए किया गया था, न कि किशोरों के आपसी सहमति के रिश्तों को जबरन अपराध की श्रेणी में डालने के लिए।
मामला सर्वोच्च न्यायालय तक कैसे पहुंचा?
यह पूरी सुनवाई किशोरों के ‘निजता के अधिकार’ (Right to Privacy of Adolescents) को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुद शुरू किए गए एक स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले पर हो रही थी। कुछ समय पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक विवादित टिप्पणी में कहा था कि किशोर लड़कियों को रिश्तों में पड़ने के बजाय अपनी इच्छाओं पर काबू रखना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस फैसले और इस तरह की प्रतिगामी टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि जिस मामले को लेकर हाई कोर्ट ने वह टिप्पणी की थी, उसमें एक नाबालिग लड़की ने 25 साल के व्यक्ति के साथ भागकर शादी की थी। वह लड़की अब उस व्यक्ति के साथ पत्नी की तरह बेहद खुशी-खुशी रह रही है और दोनों का एक बच्चा भी है। सोशल वर्कर्स की एक कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि ऐसे मामलों में हमारा सिस्टम पूरी तरह फेल साबित हो रहा है, क्योंकि 17-18 साल के लड़कों को सीधे जेल भेज दिया जाता है जिससे उनका पूरा भविष्य नष्ट हो जाता है।
कानून की व्यावहारिक चुनौतियाँ
साल 2012 में देश में सहमति से संबंध बनाने की उम्र (Age of Consent) को 16 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष किया गया था। कोर्ट ने इसे आधार बनाते हुए कहा कि ऐसा नहीं है कि यह बदलाव केवल 2012 के बाद आया है, समाज में यह पहले भी बाल विवाह के रूप में होता था। लेकिन उम्र सीमा 18 साल तय होने से अब यह सीधे तौर पर एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध बन जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सरकार और अदालतों के निर्देश व्यावहारिक होने चाहिए ताकि किसी भी युवा का भविष्य बर्बाद न हो।
केंद्र सरकार का सुझाव और स्कूल स्तर पर जागरूकता
इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार के वकील ने अदालत को एक व्यापक योजना की जानकारी दी। सरकार के अनुसार, अब कक्षा 6 से ही बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से पॉक्सो एक्ट और किशोर शिक्षा (Adolescent Education) के बारे में जागरूक किया जाएगा ताकि वे कानून और इसके परिणामों को समझ सकें।
हालांकि, जब सरकारी वकील ने इन मामलों की निगरानी के लिए एक केंद्रीय डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे तुरंत खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रत्येक हाई कोर्ट के पास पहले से ही बाल अधिकारों के लिए एक विशेष कमेटी मौजूद है और राज्य सरकारें इसकी उचित निगरानी कर सकती हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को इसमें शामिल करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस बेहद संवेदनशील और सामाजिक-कानूनी मामले पर सुप्रीम कोर्ट अब अगली सुनवाई 17 जुलाई को करेगा।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
प्रश्न 1: सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के इस्तेमाल पर क्या चिंता जताई है?
उत्तर: कोर्ट ने कहा कि 15 से 18 साल के किशोरों द्वारा आपसी सहमति से बनाए गए रिश्तों या शादी के मामलों में माता-पिता अक्सर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा (‘इज्जत’) बचाने के लिए लड़के के खिलाफ पॉक्सो के तहत झूठे या प्रतिशोधात्मक मुकदमे दर्ज करा देते हैं, जो कि कानून के मूल उद्देश्य के विपरीत है।
प्रश्न 2: भारत में सहमति से संबंध बनाने की कानूनी उम्र (Age of Consent) क्या है?
उत्तर: साल 2012 में पॉक्सो एक्ट लागू होने के बाद सहमति से संबंध बनाने की कानूनी उम्र को 16 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दिया गया था।
प्रश्न 3: इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने क्या योजना पेश की है?
उत्तर: केंद्र सरकार ने अदालतों को बताया कि स्कूली स्तर पर कक्षा 6 से ही बच्चों को उम्र के अनुसार पॉक्सो कानून और किशोर शिक्षा (Adolescent Education) के प्रति जागरूक किया जाएगा।
Disclaimer (अस्वीकरण)
यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है और इसे पेशेवर कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। कानूनी मामलों में हमेशा किसी योग्य कानूनी विशेषज्ञ या अधिवक्ता से परामर्श लें।
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