भारतीय सेना के लिए क्यों गेम-चेंजर हैं ये नए तोप के गोले?
चेन्नई. भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए, IIT मद्रास के शोधकर्ताओं ने स्वदेशी तकनीक के माध्यम से तोप के गोलों (Artillery Shells) की मारक क्षमता और सटीकता को दोगुना करने में सफलता प्राप्त की है।
यह विकास न केवल भारतीय सेना की रणनीतिक शक्ति को बढ़ाएगा, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी भारत की स्थिति को मजबूत करेगा।
तकनीक का मुख्य आधार: ‘रैमजेट’ इंजन (Ramjet Technology)
पारंपरिक तोप के गोले केवल बारूद के विस्फोट और प्रक्षेप्य (Projectile) गति पर निर्भर करते हैं, जिससे उनकी सीमा सीमित होती है। IIT मद्रास के वैज्ञानिकों ने 155mm के तोप के गोलों में ‘रैमजेट’ तकनीक का समावेश किया है।
यह कैसे काम करता है?
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हवा का उपयोग: रैमजेट इंजन वाले गोले उड़ान के दौरान वायुमंडल से ऑक्सीजन खींचते हैं। यह ऑक्सीजन गोले के भीतर मौजूद ईंधन को जलाने में मदद करती है।
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निरंतर थ्रस्ट: इससे गोले को बीच हवा में अतिरिक्त ऊर्जा और गति (Thrust) मिलती है, जिससे वह अधिक दूरी तय कर पाता है।
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सटीकता: बढ़ी हुई गति के साथ, इन गोलों में दिशा को नियंत्रित करने के लिए गाइडेंस सिस्टम भी लगाया जा सकता है, जिससे ये ‘प्रेसिजन गाइडेड म्यूनिशन’ (PGM) की तरह काम करते हैं।
मारक क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव
वर्तमान में भारतीय सेना द्वारा उपयोग किए जाने वाले मानक 155mm गोलों की रेंज लगभग 30 से 40 किलोमीटर होती है। IIT मद्रास की इस नई तकनीक के बाद:
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दूरी: इन गोलों की मारक क्षमता बढ़कर 60 से 80 किलोमीटर तक होने की उम्मीद है।
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लक्ष्य पर प्रहार: अधिक वेग (Velocity) के कारण ये गोले दुश्मन के मजबूत बंकरों को भेदने में अधिक सक्षम होंगे।
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लागत: मिसाइलों की तुलना में ये गोले काफी सस्ते पड़ते हैं, जबकि प्रभाव लगभग वैसा ही होता है।
सामरिक महत्व और ‘मेक इन इंडिया’
यह प्रोजेक्ट IIT मद्रास, म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (MIL) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है। इसके कुछ प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:
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सीमा सुरक्षा: एलएसी (LAC) और एलओसी (LoC) जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में, जहाँ लंबी दूरी तक सटीक निशाना लगाना चुनौतीपूर्ण होता है, यह तकनीक गेम-चेंजर साबित होगी।
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आयात पर निर्भरता कम: अब तक भारत को लंबी दूरी के ‘गाइडेड गोलों’ के लिए दूसरे देशों (जैसे अमेरिका या इज़राइल) पर निर्भर रहना पड़ता था। अब यह तकनीक पूरी तरह स्वदेशी है।
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निर्यात की संभावना: दुनिया भर की सेनाएं अपनी आर्टिलरी को अपग्रेड करना चाहती हैं। कम लागत में उच्च क्षमता वाले ये गोले वैश्विक बाजार में भारत के लिए बड़े अवसर खोल सकते हैं।
IIT मद्रास का यह नवाचार साबित करता है कि भारतीय शैक्षणिक संस्थान और रक्षा उद्योग मिलकर दुनिया की सबसे उन्नत सैन्य तकनीकें विकसित कर सकते हैं। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में एक बड़ा धमाका है।
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