नई दिल्ली. भारतीय इतिहास के पन्नों में 1960 का दशक अत्यंत उथल-पुथल भरा रहा। यह वह दौर था जब एक ओर देश चीन के विश्वासघात और युद्ध की विभीषिका झेल रहा था, वहीं दूसरी ओर आंतरिक राजनीति में धुर विरोधी विचारधाराएं राष्ट्र रक्षा के लिए एक मंच पर खड़ी दिख रही थीं। इस कालखंड की सबसे उल्लेखनीय घटना थी तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित करना।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1962 का संकट
अक्टूबर 1962 में चीन के आक्रमण ने भारत को चौंका दिया था। उस समय भारतीय सेना न केवल हथियारों और संसाधनों की कमी से जूझ रही थी, बल्कि नागरिक प्रशासन पर भी भारी दबाव था। इस आपातकाल के समय, संघ के तत्कालीन सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी) ने घोषणा की कि देश की सुरक्षा के लिए संघ के सभी स्वयंसेवक सरकार के आदेश पर उपलब्ध रहेंगे।
युद्ध के दौरान संघ का योगदान
जब सरकारी तंत्र का ध्यान पूरी तरह युद्ध के मोर्चे पर केंद्रित था, तब स्वयंसेवकों ने ‘द्वितीय रक्षा पंक्ति’ (Second Line of Defence) के रूप में कार्य किया:
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नागरिक प्रशासन में सहायता: दिल्ली में पुलिस बल की कमी को देखते हुए स्वयंसेवकों ने यातायात नियंत्रण (Traffic Control) का जिम्मा संभाला।
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असम और पूर्वोत्तर में साहस: जब चीनी सेना तेजपुर के करीब पहुँच गई थी और सरकारी अधिकारी पलायन कर रहे थे, तब संघ के स्वयंसेवक वहां डटे रहे और नागरिकों की मदद की।
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सेना के लिए रसद: स्वयंसेवकों ने देशभर से रसद, ऊनी कपड़े और दवाइयां एकत्र कर सेना के डिपो तक पहुंचाईं।
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रक्तदान और निगरानी: घायल सैनिकों के लिए देशव्यापी रक्तदान अभियान चलाया गया और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रेल पटरियों और बिजली घरों की सुरक्षा में नागरिक सुरक्षा दल के रूप में काम किया।
2. 1963 की गणतंत्र दिवस परेड: एक ऐतिहासिक आमंत्रण
युद्ध के दौरान संघ के निस्वार्थ सेवा भाव और जबरदस्त अनुशासन से पंडित नेहरू अत्यंत प्रभावित हुए। नेहरू, जो वैचारिक रूप से संघ के कड़े आलोचक थे, उन्होंने महसूस किया कि राष्ट्रीय संकट के समय इस तरह के अनुशासित संगठन का साथ होना आवश्यक है।
इसी उद्देश्य से, उन्होंने 26 जनवरी 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए संघ को औपचारिक निमंत्रण भेजा। संघ के पास तैयारी के लिए बहुत कम समय (करीब 10-15 दिन) था।
परेड का दृश्य
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भागीदारी: लगभग 3,500 स्वयंसेवक अपने पूर्ण गणवेश (खाकी निक्कर, सफेद कमीज और काली टोपी) में शामिल हुए।
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अनुशासन: बिना किसी औपचारिक सैन्य प्रशिक्षण के, स्वयंसेवकों ने अपने ‘घोष’ (बैंड) की धुन पर राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर ऐसा शानदार मार्च पास्ट किया कि दर्शक और विदेशी मेहमान चकित रह गए।
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प्रतीकात्मक महत्व: यह पहला और एकमात्र अवसर था जब किसी गैर-सैन्य और गैर-पुलिस संगठन के इतने बड़े जत्थे ने आधिकारिक रूप से इस परेड में भाग लिया।
3. सामाजिक प्रभाव
इस परेड के बाद आम जनता के बीच संघ की छवि एक राष्ट्रवादी और संकटमोचक संगठन के रूप में और अधिक पुख्ता हुई।
4. साक्ष्य
उस समय के प्रमुख समाचार पत्रों (जैसे The Statesman, Times of India) की रिपोर्ट और तत्कालीन तस्वीरें इस ऐतिहासिक घटना की पुष्टि करती हैं। यह भी सच है कि नेहरू के इस निर्णय की उनकी अपनी पार्टी के भीतर कुछ वामपंथी झुकाव वाले नेताओं ने आलोचना भी की थी।
निष्कर्ष
1963 की वह परेड केवल एक मार्च पास्ट नहीं थी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस गरिमा का प्रतीक थी जहाँ प्रधानमंत्री और एक सामाजिक संगठन ने मतभेदों को किनारे रखकर ‘राष्ट्र प्रथम’ के विचार को सर्वोपरि रखा। 1962 की वीरता और 1963 का वह कदम आज भी भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज है।
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