– सारांश कनौजिया
जब जेल से श्री गुरुजी ने लाल बहादुर शास्त्री को बताया संघ का असली उद्देश्य
1965 युद्ध और संघ: पत्रों के संवाद से विश्वास के धरातल तक का सफर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आज अपने शताब्दी वर्ष की दहलीज पर खड़ा है। 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. हेडगेवार द्वारा रोपा गया यह बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। लेकिन इस 100 वर्ष की यात्रा में एक कालखंड ऐसा भी था, जब संगठन के अस्तित्व को मिटाने की पुरजोर कोशिश की गई थी। उस कठिन दौर में द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी (एम.एस. गोलवलकर) और तत्कालीन नेता लाल बहादुर शास्त्री के बीच हुआ पत्राचार आज भी राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा दस्तावेज माना जाता है।
दमन का वह दौर और ‘सत्याग्रह’ की गूँज
1948 में गांधी जी की हत्या के बाद, राजनीतिक द्वेष के चलते संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। बिना किसी प्रमाण के हजारों स्वयंसेवकों को जेलों में ठूंस दिया गया। उस समय उत्तर प्रदेश के गृह मंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री प्रशासन संभाल रहे थे।
इतिहास गवाह है कि जब सरकार ने प्रतिबंध हटाने के लिए ऐसी शर्तें रखीं जो संगठन की स्वायत्तता के विरुद्ध थीं, तब श्री गुरुजी के आह्वान पर स्वतंत्र भारत का पहला सबसे बड़ा ‘अहिंसक सत्याग्रह’ हुआ। हजारों स्वयंसेवकों ने ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के साथ जेलें भर दीं, लेकिन हिंसा का सहारा नहीं लिया।
“आदरणीय शास्त्री जी…” : पत्रों में छिपी राष्ट्रभक्ति
जेल से श्री गुरुजी ने शास्त्री जी को जो पत्र लिखे, वे केवल व्यक्तिगत संवाद नहीं थे। उन पत्रों में संघ की आत्मा बसी थी। एक पत्र में गुरुजी ने लिखा था:
“हमारा उद्देश्य शासन की कुर्सी हासिल करना नहीं, बल्कि समाज के हृदय की धड़कन बनना है। विचारधारा को सलाखों के पीछे कैद करके आप सत्य को नहीं दबा सकते।”
इन पत्रों के माध्यम से शास्त्री जी को यह अहसास हुआ कि संघ का विरोध राजनीतिक कम और वैचारिक अधिक है। शास्त्री जी स्वयं एक सादगी पसंद और ईमानदार राष्ट्रवादी थे, इसलिए वे गुरुजी के तर्कों की गहराई को समझ पा रहे थे।
जब राजनीति पर भारी पड़ी ‘राष्ट्रनीति’
श्री गुरुजी ने शास्त्री जी को स्पष्ट किया था कि संघ राजनीति में नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रनीति’ में विश्वास रखता है। उन्होंने जोर दिया कि स्वयंसेवक का निर्माण किसी दल विशेष के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा के लिए किया जाता है। यही कारण था कि सरदार पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता आंतरिक रूप से संघ के प्रति एक सॉफ्ट कॉर्नर रखते थे, क्योंकि वे जानते थे कि संकट के समय यही अनुशासित शक्ति देश के काम आएगी।
विश्वास की परिणति: 1965 का युद्ध
जेल की उन चिट्ठियों से शुरू हुआ संवाद 1965 के युद्ध तक एक प्रगाढ़ विश्वास में बदल चुका था। जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आपात बैठक बुलाई। उन्होंने विशेष रूप से श्री गुरुजी को आमंत्रित किया। शास्त्री जी ने कहा था, “हमें सीमा पर सेना की जरूरत है, आप आंतरिक व्यवस्था संभालने में मदद करें।” तत्काल आदेश पर संघ के स्वयंसेवकों ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था संभाली, नागरिक सुरक्षा में हाथ बंटाया और अस्पतालों में रक्तदान के लिए कतारें लगा दीं। यह उस पत्र का ही असर था कि एक प्रधानमंत्री को अपने देश के स्वयंसेवकों पर अटूट भरोसा था।
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शताब्दी वर्ष का संकल्प
आज जब संघ अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा है, “आदरणीय शास्त्री जी” को लिखे वे पत्र याद दिलाते हैं कि यह संगठन तप और त्याग की भट्टी में तपकर निकला है। श्री गुरुजी के वे शब्द आज भी प्रासंगिक हैं कि राष्ट्र एक भौगोलिक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत ‘राष्ट्र पुरुष’ है।
पाठकों के लिए यह जानना आवश्यक है कि संघ की यात्रा केवल संख्या बल की नहीं, बल्कि वैचारिक दृढ़ता की यात्रा है। शास्त्री जी और गुरुजी का वह संवाद आज के दौर में भी ‘संवाद की राजनीति’ का एक बेहतरीन उदाहरण है।
लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं.
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