लखनऊ. संगम की रेती पर पौष पूर्णिमा के साथ शुरू हुआ माघ मेला अब अपने मुख्य पड़ाव पर है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश यानी ‘मकर संक्रांति’ के साथ ही सूर्य उत्तरायण हो गए हैं। सनातन धर्म में सूर्य के उत्तरायण होने के बाद किए गए स्नान, दान और तप का फल अनंत गुना बताया गया है।
1. सूर्य का उत्तरायण: अंधकार से प्रकाश की ओर
शास्त्रों के अनुसार, सूर्य के उत्तरायण होने का अर्थ है ‘देवताओं के दिन’ का प्रारंभ। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो दिन बड़े होने लगते हैं और नकारात्मकता का नाश होता है।
धार्मिक मान्यता: महाभारत काल में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने तक ही अपने प्राण त्यागने की प्रतीक्षा की थी, क्योंकि इस समय देह त्यागने पर मोक्ष की प्राप्ति सुलभ मानी जाती है।
2. त्रिवेणी संगम पर स्नान का महत्व
माघ के महीने में प्रयागराज में स्नान करने से ‘अश्वमेध यज्ञ’ के समान पुण्य मिलता है। संगम की पावन त्रिवेणी (गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती) में डुबकी लगाने से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय होता है। माघ मेले में ‘कल्पवास’ करने वाले श्रद्धालु सूर्य देव की उपासना के साथ इस उत्सव को भक्तिमय बनाते हैं।
3. दान-पुण्य: क्यों है यह अनिवार्य?
उत्तरायण के इस पुण्य काल में दान का विशेष महत्व है। प्रयागराज माघ मेले में मुख्य रूप से इन वस्तुओं के दान की परंपरा है:
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तिल और गुड़: मकर संक्रांति और माघ मास में तिल का दान शनि दोष को दूर करता है।
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कंबल और वस्त्र: कड़ाके की ठंड में जरूरतमंदों को ऊनी वस्त्र देना ‘पुण्य कर्म’ माना जाता है।
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खिचड़ी दान: चावल और दाल का मिश्रण (खिचड़ी) दान करना स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक है।
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गौ दान: मोक्ष की प्राप्ति के लिए संगम तट पर गौ दान को सर्वोत्तम माना गया है।
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4. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
सूर्य के उत्तरायण होने से पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में धूप की तीव्रता बढ़ती है। संगम के जल में इस समय स्नान करने से शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है और त्वचा संबंधी रोगों में लाभ मिलता है। प्रयागराज की रेती पर कल्पवास का संयमित जीवन शैली शरीर और मन को ‘डिटॉक्स’ करने का प्राकृतिक तरीका है।
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