कोलकाता. पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार और केंद्र सरकार के बीच जारी विवाद में 15 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आई-पैक (I-PAC) रेड मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारियों के खिलाफ पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर (FIR) पर रोक लगा दी है।
यह आदेश न केवल कानूनी रूप से बल्कि राजनीतिक रूप से भी बंगाल बनाम केंद्र की जंग में एक नया मोड़ है।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणियां और आदेश
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कई सख्त टिप्पणियां कीं:
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FIR पर अंतरिम रोक: कोर्ट ने बंगाल पुलिस द्वारा ED अधिकारियों पर दर्ज सभी तीन FIR की जांच और कार्यवाही पर अगली सुनवाई (3 फरवरी 2026) तक रोक लगा दी है।
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“कानूनहीनता की स्थिति”: कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि यदि इस प्रकार के हस्तक्षेप को अनदेखा किया गया, तो देश में “कानूनहीनता” (Lawlessness) की स्थिति पैदा हो जाएगी, जहां राज्य एजेंसियां केंद्रीय जांच में बाधा डालेंगी।
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CCTV फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को आदेश दिया है कि 8 जनवरी को आई-पैक कार्यालय में हुई छापेमारी के दौरान के सभी CCTV फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं।
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ममता बनर्जी को नोटिस: कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के DGP और कोलकाता पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब मांगा है।
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🔍 विवाद की जड़: आई-पैक रेड का मामला
यह पूरा कानूनी ड्रामा 8 जनवरी 2026 को शुरू हुआ, जब ED ने कथित कोयला घोटाले (Coal Scam) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कोलकाता स्थित I-PAC (Indian Political Action Committee) के दफ्तर और इसके प्रमुख प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की।
| पक्ष | प्रमुख आरोप/तर्क |
| प्रवर्तन निदेशालय (ED) | आरोप है कि रेड के दौरान CM ममता बनर्जी और पुलिस बल ने छापेमारी में बाधा डाली और महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य (हार्ड डिस्क/फाइलें) अपने साथ ले गए। |
| ममता बनर्जी/TMC | उन्होंने इसे “राजनीतिक प्रतिशोध” और चुनाव से पहले डेटा चोरी की कोशिश बताया। पुलिस ने ED अधिकारियों के खिलाफ चोरी और अनधिकृत प्रवेश की FIR दर्ज की थी। |
| सुप्रीम कोर्ट का रुख | कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों पर गौर किया कि राज्य मशीनरी का उपयोग केंद्रीय जांच को “पटरी से उतारने” के लिए किया जा रहा है। |
📊 विश्लेषण: भारतीय राजनीति और संघवाद पर प्रभाव
यह मामला महज एक छापे तक सीमित नहीं है, इसके गहरे संवैधानिक मायने हैं:
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केंद्रीय एजेंसियों की स्वायत्तता: सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप संदेश देता है कि राज्य सरकारें केंद्रीय जांच एजेंसियों के “वैधानिक कार्यों” (Statutory Functions) में अपनी पुलिस का उपयोग करके बाधा नहीं डाल सकतीं।
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संघीय ढांचा (Federal Structure) बनाम टकराव: पश्चिम बंगाल और केंद्र के बीच यह खींचतान “सहकारी संघवाद” के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
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चुनाव 2026 का प्रभाव: चूंकि बंगाल में चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में आई-पैक (जो TMC की रणनीतिकार रही है) पर रेड और फिर कानूनी जीत-हार का असर मतदाताओं की धारणा पर भी पड़ सकता है।
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