मुंबई. महाराष्ट्र निकाय चुनाव 2026 के नतीजे घोषित हो चुके हैं और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली महायुति ने राज्य भर में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। सबसे बड़ा उलटफेर मुंबई (BMC) में हुआ है, जहाँ करीब 30 साल बाद शिवसेना (अविभाजित/ठाकरे गुट) का दबदबा खत्म हो गया है।
1. मुंबई (BMC): ठाकरे का ‘किला’ ढहा, बीजेपी बनी ‘किंग’
देश की सबसे अमीर महानगरपालिका (BMC) के 227 वार्डों में महायुति ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है।
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नतीजे: बीजेपी ने 89 सीटें जीतीं, जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 29 सीटें हासिल कीं। गठबंधन की कुल 118 सीटें बहुमत के आंकड़े (114) को पार कर गई हैं।
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विपक्ष की स्थिति: उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को 65 सीटों पर संतोष करना पड़ा। कांग्रेस को 24 और राज ठाकरे की MNS को सिर्फ 6 सीटें मिलीं।
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बड़ा संदेश: राज और उद्धव ठाकरे के एक साथ आने के बावजूद मुंबईकरों ने ‘मराठी अस्मिता’ के मुकाबले ‘विकास और हिंदुत्व’ के एजेंडे को चुना।
2. पूरे महाराष्ट्र में भगवा लहर
29 नगर निगमों में हुए चुनावों में महायुति का प्रदर्शन एकतरफा रहा है:
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स्ट्राइक रेट: सीएम देवेंद्र फडणवीस के अनुसार, महायुति 25 से अधिक नगर निगमों में अपना मेयर बनाने जा रही है।
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पुणे और पिंपरी-चिंचवड़: यहाँ बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया है। पुणे में बीजेपी ने 96 सीटें जीतकर शरद पवार और अजीत पवार के गठबंधन को करारी शिकस्त दी।
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नागपुर और नासिक: बीजेपी ने नागपुर में चौथी बार सत्ता बरकरार रखी (102 सीटें), वहीं नासिक में भी बहुमत हासिल किया।
3. विपक्षी गठबंधन (MVA) की विफलता के कारण
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वोटों का बिखराव: कांग्रेस, शरद पवार गुट और उद्धव गुट के बीच तालमेल की कमी का फायदा महायुति को मिला।
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पवार का गढ़ कमजोर: पुणे और पश्चिमी महाराष्ट्र में शरद पवार की पकड़ ढीली होती दिख रही है।
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नया नेतृत्व: जनता ने एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की जोड़ी के ‘डबल इंजन’ शासन पर मुहर लगाई है।
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नगर निगम वार स्थिति (मुख्य शहर)
| नगर निगम | कुल सीटें | महायुति (BJP+) | महाविकास अघाड़ी (MVA) | अन्य |
| मुंबई (BMC) | 227 | 118 | 89 (UBT+Cong) | 20 |
| पुणे (PMC) | 165 | 123 | 39 | 3 |
| नागपुर | 151 | 103 | 36 | 12 |
| ठाणे | 131 | 83 | 43 | 5 |
यह जीत आगामी विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी के लिए ‘बूस्टर’ का काम करेगी। मुंबई में बीजेपी का मेयर बनना महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है। विपक्ष के लिए अब आत्ममंथन का समय है कि ‘ठाकरे और पवार’ ब्रांड अब शहरी मतदाताओं को आकर्षित करने में क्यों विफल हो रहे हैं।
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