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महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला: मुस्लिमों को मिलने वाला 5% आरक्षण पूरी तरह रद्द

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मुंबई. महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में मुस्लिम समुदाय के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को मिलने वाले 5% आरक्षण को लेकर एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है। सरकार द्वारा जारी नए जीआर (Government Resolution) के अनुसार, विशेष पिछड़ा वर्ग (SBC-A) के तहत मुस्लिमों के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण से जुड़े पिछले सभी फैसलों और अध्यादेशों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया है।

मुख्य घोषणाएं और बदलाव

सरकार के इस नए आदेश के बाद राज्य की आरक्षण नीति में निम्नलिखित बड़े बदलाव होंगे:

  • पुराने आदेश निरस्त: 2014 के पहले और उसके बाद के वे सभी सर्कुलर और फैसले रद्द कर दिए गए हैं, जो मुस्लिम आरक्षण का आधार थे।

  • सर्टिफिकेट पर रोक: अब ‘स्पेशल बैकवर्ड कैटेगरी’ के तहत मुस्लिम समुदाय के लोगों को जाति और नॉन-क्रीमी लेयर सर्टिफिकेट जारी नहीं किए जाएंगे।

  • नौकरी और शिक्षा: यह फैसला सरकारी, अर्ध-सरकारी नौकरियों और सभी सरकारी शैक्षणिक संस्थानों पर लागू होगा।


विवाद की पृष्ठभूमि: 2014 से 2026 तक का सफर

मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा पिछले एक दशक से अधिक समय से कानूनी और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रहा है:

  1. चव्हाण सरकार की पहल (2014): तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने चुनाव से ठीक पहले शिक्षा और नौकरियों में 5% आरक्षण का ऐलान किया था।

  2. बॉम्बे हाईकोर्ट का हस्तक्षेप: अक्टूबर 2014 में कोर्ट ने नौकरियों में आरक्षण पर तो रोक लगा दी थी, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में 5% आरक्षण को जारी रखने की अनुमति दी थी, क्योंकि समुदाय के शैक्षणिक पिछड़ेपन के प्रमाण मौजूद थे।

  3. नीतिगत शून्यता: 2015 से 2018 के बीच मामले के अदालतों में लंबित रहने और ठोस कानून न बनने के कारण यह कोटा प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पा रहा था।

  4. 2026 का अंतिम फैसला: अब सरकार ने पिछले सभी अध्यादेशों को औपचारिक रूप से रद्द कर इस विवाद पर फिलहाल विराम लगा दिया है।


फैसले का संभावित प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन मुस्लिम छात्रों को बड़ा झटका लग सकता है जो बॉम्बे हाईकोर्ट के पिछले आदेश के आधार पर शिक्षा में आरक्षण की उम्मीद कर रहे थे। अब उन्हें सामान्य श्रेणी या अन्य उपलब्ध श्रेणियों (जैसे OBC) के माध्यम से ही आवेदन करना होगा।

विशेष नोट: सरकार के इस फैसले को राजनीतिक हलकों में ‘समानता’ और ‘तुष्टिकरण के अंत’ के तौर पर पेश किया जा रहा है, जबकि विपक्षी दल इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ बता सकते हैं।

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