लखनऊ. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन (AIPOC) में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने देश के संसदीय ढांचे के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने राज्यों की विधानसभाओं में सत्रों की लगातार घटती अवधि और चर्चा के गिरते स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त की।
1. घटती कार्य अवधि: एक चिंताजनक आंकड़ा
ओम बिरला ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि कई राज्यों में विधानसभा सत्र अब केवल खानापूर्ति बनकर रह गए हैं। कुछ साल पहले तक जहाँ सत्र महीनों चलते थे, अब वे चंद दिनों या हफ्तों में सिमट रहे हैं।
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प्रभाव: जब सत्र छोटे होते हैं, तो महत्वपूर्ण विधेयकों (Bills) पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती।
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परिणाम: बिना बहस के कानून पारित होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।
2. चर्चा बनाम शोर-शराबा (Disruption vs Discussion)
सम्मेलन के दौरान बिरला ने इस बात पर जोर दिया कि सदनों में ‘व्यवधान’ को राजनीति का हथियार बना लिया गया है। उन्होंने कहा कि “सदन चर्चा के लिए हैं, हंगामे के लिए नहीं।”
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संसदीय गरिमा का ह्रास: सदन में तख्तियां दिखाना, वेल में आना और नारेबाजी करना सत्र की कार्य अवधि को और कम कर देता है।
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जनता के मुद्दों की अनदेखी: जब सदन नहीं चलता, तो जनता के बुनियादी मुद्दे जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर प्रश्नकाल (Question Hour) बाधित होता है।
3. पीठासीन अधिकारियों की भूमिका और निष्पक्षता
86वें सम्मेलन का मुख्य केंद्र पीठासीन अधिकारियों (Speakers) की शक्तियों और उनकी निष्पक्षता पर भी रहा। ओम बिरला ने सुझाव दिया कि:
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नियमों में एकरूपता: देश भर की विधानसभाओं के नियमों में एकरूपता लाने की जरूरत है।
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डिजिटलीकरण: ‘डिजिटल संसद’ की तर्ज पर सभी विधानसभाओं को जोड़ना ताकि डेटा और सूचनाओं का आदान-प्रदान सुगम हो सके।
4. सत्रों की अवधि बढ़ाने के लिए क्या होना चाहिए? (विश्लेषण)
विशेषज्ञों और लोकसभा अध्यक्ष के सुझावों के आधार पर कुछ प्रमुख बिंदु उभर कर आते हैं:
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न्यूनतम कार्यदिवस तय हों: संविधान विशेषज्ञ अक्सर सुझाव देते हैं कि संसद और विधानसभाओं के लिए साल में न्यूनतम 60 से 100 कार्यदिवस अनिवार्य होने चाहिए।
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व्यवधान पर जवाबदेही: सदन को बाधित करने वाले सदस्यों पर सख्त कार्रवाई के नियमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
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प्रभावी समितियों का गठन: यदि सदन में समय कम है, तो स्थायी समितियों (Standing Committees) को अधिक सशक्त किया जाए ताकि वे विधेयकों की सूक्ष्म जांच कर सकें।
5. भविष्य की राह: ‘लखनऊ संकल्प’
लखनऊ का यह सम्मेलन केवल एक बैठक नहीं, बल्कि भारतीय संसदीय प्रणाली के सुधार का एक रोडमैप है। ओम बिरला का संदेश साफ है— “विधानसभाएं केवल सरकार की नीतियों पर मुहर लगाने की जगह नहीं, बल्कि विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच सार्थक संवाद का केंद्र होनी चाहिए।”
निष्कर्ष
विधानसभा सत्रों की घटती अवधि केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों मतदाताओं के विश्वास के साथ खिलवाड़ है जिन्होंने अपने प्रतिनिधियों को अपनी आवाज उठाने के लिए सदन भेजा है। ओम बिरला की चिंता पर यदि राज्य सरकारें और विधानसभा अध्यक्ष गंभीरता से विचार नहीं करते, तो संसदीय लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है।
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