कोच्चि । गुरुवार, 20 अगस्त 2026:
केरल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को केरल स्टेट वक्फ बोर्ड में मौजूद सभी रिक्तियों को छह सप्ताह (30 सितंबर 2026 तक) के भीतर भरने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति स्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने 19 अगस्त 2026 को जनहित याचिकाओं (PIL) की सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया।
मामले से जुड़े प्रमुख तथ्य
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विवाद का मूल: भाजपा नेता शोन जॉर्ज सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि संशोधित वक्फ कानून (2025) के अनुसार बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों का होना अनिवार्य है, जिसका पालन नहीं किया जा रहा है।
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समुदायों का प्रतिनिधित्व: याचिकाओं में शिया, सुन्नी, बोहरा, आगाखानी और पिछड़े मुस्लिम वर्गों से एक-एक सदस्य को शामिल न करने का मुद्दा भी उठाया गया। राज्य सरकार ने बताया कि वह इन समुदायों की संख्या का सटीक निर्धारण करने के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के जरिए सर्वेक्षण करा रही है।
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सरकार का पक्ष: राज्य के एडवोकेट जनरल के. जाजू बाबू ने अदालत को सूचित किया कि संशोधित कानून के अनुरूप रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है।
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पुनर्गठन पर स्थिति: हाईकोर्ट ने फिलहाल यह अंतिम रूप से तय नहीं किया है कि मौजूदा वक्फ बोर्ड का पूरी तरह पुनर्गठन किया जाना आवश्यक है या नहीं; इस व्यापक कानूनी सवाल को आगे की सुनवाई के लिए खुला रखा गया है।
| विवरण | अहम जानकारी |
| सुनवाई पीठ | मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति स्याम कुमार वी.एम. |
| निर्देश की समय-सीमा | 6 सप्ताह (30 सितंबर 2026 तक) |
| कानूनी आधार | वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 |
| अगली सुनवाई | 30 सितंबर 2026 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
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केरल हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड मामले में क्या आदेश दिया है?अदालत ने राज्य सरकार को 6 सप्ताह के भीतर वक्फ बोर्ड की रिक्तियां भरने और उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
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वक्फ बोर्ड को लेकर मुख्य विवाद क्या है?संशोधित वक्फ कानून के तहत बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों और शिया, सुन्नी व बोहरा जैसे अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदायों का आवश्यक प्रतिनिधित्व पूरा न होना विवाद का मुख्य कारण है।
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क्या पूरे वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन होगा?अदालत ने इस सवाल को अगली सुनवाई के लिए सुरक्षित रखा है, लेकिन सरकार को तब तक रिक्तियां भरने को कहा है।
Disclaimer: यह लेख समाचार रिपोर्ट्स और अदालती कार्यवाहियों की जानकारी पर आधारित है। किसी भी वैधानिक या कानूनी संदर्भ के लिए आधिकारिक न्यायालय के आदेशों को ही अंतिम और प्रामाणिक मानें।
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