प्रयागराज. माघ मेला क्षेत्र में नियमों के उल्लंघन को लेकर प्रशासन और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच उपजा विवाद अब गहरा गया है। इस मामले में जगतगुरु रामभद्राचार्य के हस्तक्षेप और प्रशासन की सख्त चेतावनी ने इसे और अधिक चर्चा में ला दिया है।
जगतगुरु रामभद्राचार्य का रुख
प्रसिद्ध कथावाचक और विद्वान जगतगुरु रामभद्राचार्य ने इस मुद्दे पर प्रशासन के कदम का स्पष्ट समर्थन किया है। उनके वक्तव्य के प्रमुख बिंदु:
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नियमों की सर्वोच्चता: उन्होंने कहा कि “नियम सबके लिए समान हैं,” चाहे वह कोई सामान्य व्यक्ति हो या कोई बड़ा संत।
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मर्यादा का पालन: उन्होंने जोर देकर कहा कि रथ को पैदल क्षेत्र में ले जाना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में व्यवधान डालना भी है।
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अनुशासन: उन्होंने संतों से अपील की कि वे समाज के लिए उदाहरण पेश करें और मेला प्रशासन के साथ सहयोग करें।
माघ मेला 2026 में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच उपजे विवाद पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने न केवल प्रशासन के नियमों का समर्थन किया है, बल्कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ की गई टिप्पणियों की भी तीखी निंदा की है।
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मुख्यमंत्री के प्रति अभद्र भाषा पर आपत्ति
महंत रवींद्र पुरी ने स्पष्ट रूप से कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा मुख्यमंत्री के लिए जिस तरह की भाषा का उपयोग किया गया, वह एक संत को शोभा नहीं देती।
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बयान: “हमारे मुख्यमंत्री स्वयं एक संत हैं। यदि हम (संत समाज) उनका सम्मान नहीं करेंगे, तो दूसरा कौन करेगा? मुख्यमंत्री को गाली देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।”
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दूरी बनाने की चेतावनी: उन्होंने कहा कि ऐसे संतों से अखाड़ा परिषद और संत समाज को दूरी बनानी पड़ेगी जो मर्यादा का उल्लंघन करते हैं।
नियमों का पालन अनिवार्य
अखाड़ा परिषद ने प्रशासन के इस तर्क का समर्थन किया कि मेले की व्यवस्था सबके लिए समान है।
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शाही स्नान का भ्रम: महंत रवींद्र पुरी ने स्पष्ट किया कि माघ मेले में ‘शाही स्नान’ की कोई परंपरा नहीं होती (यह कुंभ में होती है)। इसलिए, प्रोटोकॉल के नाम पर भीड़भाड़ वाले पैदल मार्ग पर रथ ले जाने की जिद करना गलत था।
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सुरक्षा सर्वोपरि: उन्होंने कहा कि करोड़ों की भीड़ के बीच प्रशासन का काम सुरक्षा सुनिश्चित करना है, और संतों को इसमें सहयोग करना चाहिए न कि बाधा डालनी चाहिए।
विवाद का प्रशासनिक समाधान
अध्यक्ष ने सुझाव दिया कि यदि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को प्रशासन से कोई शिकायत थी, तो उन्हें सीधे मुख्यमंत्री या उच्च अधिकारियों से संवाद करना चाहिए था, न कि सार्वजनिक रूप से विरोध प्रदर्शन और अपमानजनक बयानबाजी।
अखाड़ा परिषद के महामंत्री का रुख
अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरिगिरि ने भी इस घटना पर दुख जताते हुए इसे ‘प्रयागराज की गरिमा पर चोट’ बताया। उन्होंने भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रशासन को क्लीन चिट देते हुए कहा कि अधिकारी केवल नियमों का पालन कर रहे थे ताकि कोई दुर्घटना न हो।
अखाड़ा परिषद के इस रुख से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संत समाज में अलग-थलग पड़ते नजर आ रहे हैं, क्योंकि धर्म की सर्वोच्च संस्था (अखाड़ा परिषद) ने प्रशासन और मुख्यमंत्री के पक्ष को सही ठहराया है।
प्रशासन की सख्त कार्रवाई और चेतावनी
प्रयागराज प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को औपचारिक नोटिस जारी किया है। नोटिस की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
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सुविधाओं की कटौती: मेले में शिविर के लिए आवंटित भूमि, बिजली, पानी और अन्य सरकारी सुविधाओं को रद्द करने की चेतावनी दी गई है।
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स्थायी प्रतिबंध: भविष्य में होने वाले माघ मेलों और कुंभ आयोजनों में उनके प्रवेश या शिविर आवंटन पर स्थायी रोक (Blacklist) लगाने का संकेत दिया गया है।
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कानूनी आधार: यह कार्रवाई मेला क्षेत्र के सुरक्षा मैनुअल और ‘मेला अधिनियम’ के उल्लंघन के तहत की जा रही है।
प्रशासन की इस सख्ती से यह स्पष्ट संदेश गया है कि माघ मेले की सुरक्षा और व्यवस्था के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। रामभद्राचार्य जैसे प्रभावशाली व्यक्तित्व के समर्थन ने प्रशासन के पक्ष को और मजबूती दी है।
घटनाक्रम का मुख्य कारण
विवाद की मुख्य जड़ प्रतिबंधित क्षेत्र में रथ का प्रवेश है। माघ मेले के दौरान सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के दृष्टिगत प्रशासन ने कुछ क्षेत्रों को ‘नो-व्हीकल ज़ोन’ (पैदल क्षेत्र) घोषित किया है।
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उल्लंघन: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर आरोप है कि उन्होंने नियमों की अनदेखी करते हुए अपने रथ को पैदल मार्ग पर ले जाने का प्रयास किया।
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प्रशासनिक तर्क: अधिकारियों का कहना है कि संकरे मार्गों पर भारी वाहनों या रथों के जाने से भगदड़ की स्थिति बन सकती है और श्रद्धालुओं की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
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