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Dayanidhi Maran Case: सुप्रीम कोर्ट से डीएमके सांसद को झटका, टेलीफोन एक्सचेंज मामले में मद्रास HC का आदेश रद्द

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Supreme Court Verdict Legal News Montage
चेन्नई । शनिवार, 22 अगस्त 2026
पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री और डीएमके सांसद दयानिधि मारन से जुड़े बहुचर्चित कथित अवैध टेलीफोन एक्सचेंज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने सीबीआई (CBI) की याचिका पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केंद्रीय दूरसंचार सचिव को ‘कोर्ट विटनेस’ (Court Witness) के तौर पर समन करने की अनुमति दी गई थी। शीर्ष अदालत के इस रुख से निचली अदालत का मूल आदेश बहाल हो गया है।

क्या था विवाद और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी?

सीबीआई का आरोप है कि 2004 से 2007 के बीच दूरसंचार मंत्री रहते हुए दयानिधि मारन ने अपने चेन्नई स्थित आवास पर सैकड़ों उच्च क्षमता वाली ISDN और लीज्ड टेलीफोन लाइनें लगवाईं। इन लाइनों का कथित तौर पर मारन के पारिवारिक व्यवसाय ‘सन टीवी नेटवर्क’ द्वारा व्यावसायिक डेटा ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल किया गया, जिससे सरकारी दूरसंचार कंपनियों (BSNL/MTNL) को करीब ₹1.78 करोड़ का वित्तीय नुकसान हुआ।
मारन ने मांग की थी कि तत्कालीन नियमों और प्रक्रियाओं को स्पष्ट करने के लिए केंद्रीय दूरसंचार सचिव को कोर्ट विटनेस बनाया जाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि किसी वरिष्ठ अधिकारी को कोर्ट की ओर से गवाह के रूप में बुलाने का विशेष अधिकार क्षेत्र हर मामले में लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने मारन को विकल्प दिया है कि वे चाहें तो दूरसंचार सचिव को अपने बचाव पक्ष के गवाह (Defence Witness) के रूप में पेश कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. क्या सुप्रीम कोर्ट ने दयानिधि मारन को मामले में बरी या दोषी ठहराया है?
नहीं, यह फैसला केवल प्रक्रियात्मक पहलू (गवाह को समन करने की प्रक्रिया) पर आधारित है। मामले के मुख्य आपराधिक आरोपों पर ट्रायल कोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी।
Q2. ‘कोर्ट विटनेस’ और ‘बचाव पक्ष के गवाह’ में क्या अंतर है?
‘कोर्ट विटनेस’ को अदालत स्वयं निष्पक्ष रूप से मामला समझने के लिए बुलाती है, जबकि ‘बचाव पक्ष का गवाह’ (Defence Witness) आरोपी द्वारा अपने बचाव में साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए अदालत में लाया जाता है।
Q3. यह मामला किस कानून के तहत दर्ज किया गया है?
यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120B, 409, 467, 471 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के तहत दर्ज है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत तथ्य कानूनी कार्यवाहियों और सार्वजनिक मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। इसे किसी कानूनी सलाह के रूप में न लिया जाए।
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