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Pandharpur Vitthal Idol Chemical Coating Case: सोलापुर कोर्ट ने भगवान विट्ठल की मूर्ति पर रासायनिक लेप लगाने पर लगाई अंतरिम रोक, जानें क्या है पूरा विवाद

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पंढरपुर  मंगलवार, 23 जून 2026

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले की एक स्थानीय अदालत ने आषाढ़ी एकादशी (Ashadi Ekadashi) की महातीर्थयात्रा से ठीक पहले एक बड़ा फैसला सुनाया है। संयुक्त सिविल जज एस.एस. राउल (Joint Civil Judge S S Raul) ने पंढरपुर के विश्व प्रसिद्ध श्री विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर समिति (Shri Vitthal Rukmini Temple Committee) को भगवान विट्ठल की प्राचीन स्वयंभू मूर्ति पर रासायनिक सुरक्षा परत (Chemical Coating) लगाने से अस्थायी रूप से रोक दिया है।

अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि प्रशासनिक समितियों का काम व्यवस्था संभालना है, वे मूर्ति पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकते। मूर्ति पर पहला हक भक्तों और उनकी धार्मिक परंपराओं का है।

क्या है पूरा मामला और क्यों हुआ विवाद?

भारतीय पुरातत्व विभाग (Archaeology Department) ने नियमित जांच के दौरान पाया था कि लगातार जल-अभिषेक, स्पर्श-दर्शन और समय के साथ मूर्ति के पैरों व कुछ हिस्सों में मामूली झीज (wear and tear) हो रही है। इसके संरक्षण के लिए मंदिर समिति ने 23 और 24 जून को मंदिर के गर्भगृह को बंद रखकर मूर्ति पर एपॉक्सी रेजिन (Epoxy Resin) जैसी आधुनिक रसायनों की परत चढ़ाने का कार्यक्रम तय किया था।

जैसे ही इस रासायनिक प्रक्रिया की घोषणा हुई, महाराष्ट्र मंदिर महासंघ (Maharashtra Mandir Mahasangh) और वारकरी संप्रदाय (Warkari Groups) के भक्तों ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया। विवाद बढ़ता देख भक्तों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिस पर सुनवाई करते हुए सोमवार को कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक (Injunction) लगा दी।

याचिकाकर्ताओं का तर्क: शास्त्रों का उल्लंघन और ‘देवत्व’ को खतरा

वारकरी संप्रदाय और मंदिर महासंघ की ओर से अदालत में दलील दी गई कि:

  1. शास्त्रों का उल्लंघन: एपॉक्सी रेजिन जैसे कृत्रिम और आधुनिक रसायनों का उपयोग प्राचीन धार्मिक शास्त्रों (Shastras) के खिलाफ है। इससे सदियों पुराने विग्रह (मूर्ति) की पवित्रता प्रभावित होती है।

  2. पत्थर की प्राकृतिक श्वसन प्रक्रिया में बाधा: महासंघ का दावा है कि रासायनिक कोटिंग के कारण पत्थर की प्राकृतिक श्वसन प्रक्रिया (natural breathing) रुक जाती है। इससे समय के साथ मूर्ति खोखली या भंगुर (brittle) होकर टूट सकती है।

  3. पारंपरिक वज्रलेप की मांग: याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यदि मूर्ति का संरक्षण करना ही है, तो रसायनों के बजाय आयुर्वेद और शास्त्रों में वर्णित पारंपरिक प्राकृतिक ‘वज्रलेप’ विधि का उपयोग किया जाना चाहिए।

‘मूर्ति सभी भक्तों की है, समिति केवल संरक्षक है’ — अदालत की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मंदिर समिति ने दलील दी थी कि जुलाई में आने वाली आषाढ़ी एकादशी की वारी (Pandharpur Wari) में लाखों लोग जुटेंगे, इसलिए सुरक्षात्मक कोटिंग जरूरी है। उन्होंने याचिकाकर्ताओं के अधिकार क्षेत्र (Locus Standi) पर भी सवाल उठाए थे।

न्यायाधीश एस.एस. राउल ने समिति के इन तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“प्रशासनिक समिति केवल एक संरक्षक (Custodian) के रूप में कार्य कर रही है जिसका काम मंदिर का सुचारू संचालन सुनिश्चित करना है। वे मूर्ति पर किसी भी प्रकार के स्वामित्व या संप्रभुता (Sovereignty and Ownership) का दावा नहीं कर सकते। मूर्ति सभी भक्तों की है, इसलिए मूर्ति को प्रभावित करने वाला कोई भी निर्णय भक्तों की प्राथमिक चिंता का विषय है।”

अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी कहा कि मूर्ति वर्तमान में संरक्षण की अच्छी स्थिति में है, इसलिए भक्तों की आपत्तियों और भावनाओं को दरकिनार कर रासायनिक लेप लगाने की कोई तात्कालिक या आपातकालीन आवश्यकता (Immediate Emergency) नहीं है। जब तक समिति इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री पर स्पष्टीकरण नहीं देती, इस प्रक्रिया पर रोक रहेगी।

आगे क्या होगा?

अदालत के इस अस्थायी आदेश के बाद मंदिर समिति ने अपनी प्रस्तावित संवर्धन प्रक्रिया को फिलहाल टाल दिया है। मंदिर समिति के कार्यकारी अधिकारी राजेंद्र शेळके के मुताबिक, कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए 23 और 24 जून को भी मंदिर को भक्तों के दर्शन के लिए पूर्ववत खुला रखा गया है। हालांकि, समिति ने इस अंतरिम रोक के खिलाफ ऊपरी अदालत (Senior Court) में अपील दायर की है, जिस पर आगे की सुनवाई होनी तय है।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब महाराष्ट्र के कोने-कोने से किसान, मजदूर और आम लोगों सहित लाखों वारकरी पैदल यात्रा (Wari 2026) कर पंढरपुर पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं। भक्तों के लिए भगवान विट्ठल की मूर्ति की सुरक्षा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उनकी सदियों पुरानी आस्था और परंपराओं का अक्षुण्ण रहना भी है।

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