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कचरे से कंचन: लखनऊ का ‘जीरो वेस्ट’ मॉडल बना मिसाल, अन्य शहरों के लिए बना मास्टरप्लान

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लखनऊ वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट में कचरे का निस्तारण करते कर्मचारी।

लखनऊ. शहर का ‘Zero Fresh Waste Dump City’ बनना न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश के शहरी विकास के लिए एक मिसाल है। इसका सीधा मतलब यह है कि शहर से निकलने वाला रोज़ाना का कचरा (Fresh Waste) अब लैंडफिल साइट (कूड़े के पहाड़ों) पर नहीं फेंका जा रहा, बल्कि उसका शत-प्रतिशत निस्तारण (Processing) किया जा रहा है।

लखनऊ मॉडल के मुख्य स्तंभ (The Lucknow Strategy)

लखनऊ नगर निगम (LMC) ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ‘3-R’ (Reduce, Reuse, Recycle) सिद्धांत और आधुनिक तकनीक का मेल किया है:

    1. कचरे का पृथक्करण (Source Segregation): घर-घर से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग इकट्ठा करना।

    2. MRF सेंटर (Material Recovery Facilities): सूखे कचरे से प्लास्टिक, कांच और धातु को अलग कर उन्हें रीसायकल करना।

    3. कम्पोस्टिंग और बायोगैस: गीले कचरे से जैविक खाद या ‘Waste-to-Energy’ प्लांट के जरिए बिजली/गैस बनाना।

    4. Legacy Waste का उपचार: पुराने जमा कूड़े के पहाड़ों को बायो-माइनिंग के जरिए खत्म करना।

अन्य शहरों के लिए क्रियान्वयन रणनीति (How to Replicate)

किसी भी अन्य शहर (जैसे कानपुर, वाराणसी या मेरठ) में इसे लागू करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करना होगा:

1. विकेंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन (Decentralized Management)

पूरे शहर का कचरा एक ही जगह ले जाने के बजाय, उसे वार्ड स्तर पर ही प्रोसेस किया जाए। इससे परिवहन लागत कम होती है और प्रबंधन आसान होता है।

2. वेस्ट-टू-एनर्जी और पीपीपी मॉडल

  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP): निजी कंपनियों को कचरे से बिजली या कोयला (Refuse Derived Fuel – RDF) बनाने के लिए आमंत्रित करना।

  • सीमेंट उद्योगों के साथ गठजोड़: सूखे कचरे (प्लास्टिक/कपड़ा) को सीमेंट भट्टियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना।

3. डिजिटल निगरानी (Smart Tracking)

  • GPS इनेबल्ड गाड़ियाँ: कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों की रियल-टाइम ट्रैकिंग।

  • QR कोड अटेंडेंस: हर घर के बाहर QR कोड लगाकर यह सुनिश्चित करना कि वहां से कचरा उठाया गया है।

4. जन-भागीदारी और जागरूकता

  • जब तक नागरिक गीला और सूखा कचरा अलग नहीं करेंगे, तब तक कोई भी मॉडल सफल नहीं हो सकता। इसके लिए ‘स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर’ और वार्ड-स्तरीय समितियों का गठन अनिवार्य है।

मॉडल को लागू करने में चुनौतियाँ और समाधान

चुनौती समाधान
फंड की कमी कार्बन क्रेडिट बेचकर राजस्व उत्पन्न करना और कचरा शुल्क (User Charges) को पारदर्शी बनाना।
जगह का अभाव छोटे शहरों में ‘कंपैक्ट कंपोस्टिंग यूनिट्स’ का उपयोग करना।
तकनीकी ज्ञान लखनऊ नगर निगम के विशेषज्ञों के साथ ‘नॉलेज शेयरिंग’ वर्कशॉप आयोजित करना।

लखनऊ का सफल होना यह साबित करता है कि इच्छाशक्ति और सही तकनीक से कूड़े के पहाड़ों को खत्म किया जा सकता है। यह मॉडल न केवल पर्यावरण को बचाएगा, बल्कि शहरों को “गार्बेज फ्री सिटी” (Star Rating) की दौड़ में भी आगे ले जाएगा।

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