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संपादकीय: जनसांख्यिकीय असंतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा—कठोर कानूनों की अपरिहार्यता

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भारत का मानचित्र

जनसांख्यिकीय असंतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा: क्या सीमावर्ती राज्यों में बदल रही है भारत की सूरत?

इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी राष्ट्र की जनसांख्यिकी (Demography) में अनियंत्रित बदलाव आए हैं, तब-तब उस राष्ट्र का भूगोल बदला है। भारत जैसे विविध और संवेदनशील देश के लिए, विशेषकर इसके सीमावर्ती राज्यों में, आबादी का बदलता अनुपात मात्र एक सामाजिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय संप्रभुता और अखंडता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। पिछले कुछ वर्षों में असम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड और राजस्थान के सीमावर्ती जिलों से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे नीति-निर्माताओं और सुरक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त हैं।

सीमावर्ती राज्यों का संकट: एक शांत आक्रमण?

भारत की हजारों किलोमीटर लंबी सीमाएं केवल सीमाओं की रखवाली नहीं करतीं, बल्कि वे हमारी संस्कृति और राष्ट्रवाद की प्रथम रक्षा पंक्ति हैं। खुफिया एजेंसियों और सीमा सुरक्षा बल (BSF) की कई रिपोर्ट्स ने इस ओर इशारा किया है कि सीमा से सटे 50 किलोमीटर के दायरे में एक विशेष समुदाय की जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। असम के कई जिले अपनी मूल पहचान खो चुके हैं, वहीं उत्तराखंड जैसी ‘देवभूमि’ के पहाड़ों में भी जनसांख्यिकीय बदलाव की लहरें पहुंच चुकी हैं। इसे “मौन आक्रमण” की संज्ञा देना गलत नहीं होगा, क्योंकि यह बिना किसी युद्ध के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सामाजिक बनावट को बदल रहा है।

‘लैंड जिहाद’ और अवैध अतिक्रमण पर प्रहार

हाल के वर्षों में ‘लैंड जिहाद’ शब्द चर्चा के केंद्र में रहा है। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि सरकारी और वन भूमि पर सुनियोजित तरीके से किए जा रहे अवैध कब्जों की वास्तविकता है। उत्तराखंड सरकार द्वारा हज़ारों अवैध मजारों और ढांचों को हटाना इस बात का प्रमाण है कि कैसे सार्वजनिक संपत्तियों पर धार्मिक पहचान के माध्यम से कब्जा किया गया। जब महत्वपूर्ण राजमार्गों, रेलवे लाइनों और संवेदनशील वन क्षेत्रों के आसपास अवैध बस्तियां बसने लगती हैं, तो वे आंतरिक सुरक्षा के लिए “स्लीपर सेल” जैसा जोखिम पैदा करती हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों द्वारा लाए गए ‘नजूल भूमि’ कानून और सख्त अतिक्रमण विरोधी अभियान इसी खतरे को भांपते हुए उठाए गए कदम हैं।

UCC: संवैधानिक समानता की ओर बढ़ते कदम

इस जनसांख्यिकीय असंतुलन को रोकने के लिए ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) एक ब्रह्मास्त्र की तरह है। उत्तराखंड ने इसे लागू कर देश को एक दिशा दिखाई है। जब एक देश में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के कानून सबके लिए समान होंगे, तो जनसंख्या के अनियंत्रित प्रसार और सामाजिक कुरीतियों पर स्वतः ही लगाम लगेगी। UCC को किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध देखने के बजाय इसे “राष्ट्र प्रथम” की अवधारणा के रूप में देखना आवश्यक है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘वोट बैंक’ की राजनीति जनसंख्या असंतुलन का लाभ न उठा सके।

सतर्कता ही सुरक्षा है

भारत अपनी लोकतांत्रिक उदारता के लिए जाना जाता है, लेकिन उदारता का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं होना चाहिए। सीमावर्ती राज्यों में सख्त कानूनी दखल—चाहे वह धर्म परिवर्तन विरोधी कानून हो, लैंड जिहाद के खिलाफ कार्रवाई हो या UCC का क्रियान्वयन—आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता है। केंद्र सरकार द्वारा BSF के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाना और राज्यों द्वारा अपनी पहचान बचाने के लिए उठाए गए कदम स्वागत योग्य हैं।

यदि हमें भविष्य में विभाजन जैसी विभीषिका से बचना है, तो हमें आज ही अपनी सीमाओं की जनसांख्यिकी को सुरक्षित करना होगा। क्योंकि अंततः, राष्ट्र की सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि एक जागरूक समाज और सुदृढ़ कानूनों से होती है।

– सारांश कनौजिया, संपादक

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