लखनऊ. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का भारतीय संविधान सभा में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और वैचारिक गहराई वाला था। कानपुर की धरती से चुनकर आए नवीन जी ने न केवल एक राजनेता के रूप में, बल्कि एक कवि और भाषाविद के रूप में भी संविधान के निर्माण में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
पंडित बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ केवल ओजस्वी कवि और निर्भीक पत्रकार ही नहीं थे, बल्कि वे उन महान व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत की नियति यानी हमारे ‘संविधान’ को अपने विचारों से आकार दिया। 1946 में वे ‘संयुक्त प्रांत’ (अब उत्तर प्रदेश) से संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य चुने गए और संविधान निर्माण की तीन साल लंबी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई।
1. संघीय ढांचे और राज्यों की स्वायत्तता पर विचार
संविधान सभा की बहसों में नवीन जी ने भारत के फेडरल स्ट्रक्चर (संघीय ढांचे) पर अपने स्पष्ट विचार रखे थे। उन्होंने राज्यों की स्वायत्तता और केंद्र की शक्तियों के बीच संतुलन की वकालत की।
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उनका मानना था कि प्रत्येक राज्य को अपनी आंतरिक स्वतंत्रता होनी चाहिए ताकि वे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार विकास कर सकें।
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साथ ही, राष्ट्र की अखंडता के लिए उन्होंने सिफारिश की थी कि डिफेंस (रक्षा) और करेंसी (मुद्रा) जैसे महत्वपूर्ण विषय पूरी तरह से केंद्र के नियंत्रण में रहने चाहिए।
2. हिंदी और राजभाषा के प्रबल पैरोकार
नवीन जी का सबसे प्रमुख और यादगार योगदान राजभाषा हिंदी के प्रश्न पर था। एक महान हिंदी कवि होने के नाते, उन्होंने संविधान सभा में हिंदी को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए पुरजोर बहस की।
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वे हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने वाले प्रखर वक्ताओं में शामिल थे।
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संविधान लागू होने के बाद, वे 1955 में गठित ‘राजभाषा आयोग’ के सदस्य भी बने, जहाँ उन्होंने प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के प्रयोग की रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
3. सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्य
नवीन जी के व्यक्तित्व पर गांधीवाद और राष्ट्रीय आंदोलन का गहरा प्रभाव था। उन्होंने संविधान में ऐसे प्रावधानों का समर्थन किया जो अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति (मजदूरों और किसानों) के अधिकारों की रक्षा करते हों।
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कानपुर के मजदूर आंदोलनों से उनके जुड़ाव ने उन्हें संविधान में ‘आर्थिक न्याय’ की महत्ता को समझने में मदद की।
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उनकी वाणी में सदैव ‘विद्रोह और चेतना’ का स्वर रहता था, जिसने संविधान को एक ‘जीवंत दस्तावेज’ बनाने में मदद की जो केवल कानून की किताब नहीं, बल्कि आम जन की भावनाओं का दर्पण बने।
4. कानपुर का गौरव और संसदीय सफर
कानपुर नवीन जी की ‘कर्मभूमि’ रही। संविधान सभा के बाद, जब 1951-52 में देश में पहले आम चुनाव हुए, तो वे कानपुर उत्तर-फर्रुखाबाद दक्षिण क्षेत्र से लोकसभा के पहले सदस्य चुने गए। उनकी विद्वत्ता और तर्कों के कारण उन्हें राजनीति में ‘शेर-ए-कानपुर’ (Lion of Kanpur) के नाम से भी जाना जाता था। 1960 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके इसी महान योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया था।
पंडित बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का संविधान निर्माण में योगदान उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचायक है। उन्होंने संविधान को वह ‘सांस्कृतिक और भाषाई आधार’ प्रदान किया, जो भारत जैसे विविधतापूर्ण देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए आवश्यक था। आज जब हम संविधान के गौरव की बात करते हैं, तो नवीन जी के विचार हमें एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र की राह दिखाते हैं।
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