प्रयागराज | 26 मार्च, 2026
1984 के सिख विरोधी दंगों के जख्म एक बार फिर न्याय की चौखट पर हरे हो गए हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानपुर में हुए दंगों से जुड़े मामलों में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि मानवता के खिलाफ किए गए अपराधों को समय की धूल में दबाया नहीं जा सकता। न्यायमूर्ति अनिश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने नौ आरोपियों द्वारा दायर सात याचिकाओं को खारिज करते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का आदेश दिया है।
कोर्ट की दो टूक: “दस्तावेजों का अभाव न्याय का रास्ता नहीं रोक सकता”
आरोपियों, जिनमें प्रदीप अग्रवाल और अन्य शामिल थे, ने दलील दी थी कि घटना के 40 साल बाद न तो मूल एफआईआर उपलब्ध है और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट। उनका तर्क था कि रिकॉर्ड के अभाव में निष्पक्ष ट्रायल संभव नहीं है।
हालांकि, कोर्ट ने इन तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए कहा:
“1984 की घटनाएं एक विशेष समुदाय के खिलाफ ‘नरसंहार’ (Genocide) जैसी थीं। केवल मूल रिकॉर्ड के नष्ट होने या दीमक द्वारा खा लिए जाने के आधार पर इतने जघन्य अपराध के दोषियों को छोड़ा नहीं जा सकता।”
फैसले की 5 बड़ी बातें (Key Highlights):
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पुनर्निर्मित रिकॉर्ड मान्य: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIT द्वारा पुनर्निर्मित (Reconstructed) की गई एफआईआर और गवाहों के नए बयानों के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
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SIT की जांच पर मुहर: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (SIT) द्वारा 2020 से 2022 के बीच जुटाए गए सबूतों को कोर्ट ने ट्रायल के लिए पर्याप्त माना।
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देरी का बहाना खत्म: कोर्ट ने कहा कि जघन्य अपराधों में देरी का लाभ आरोपियों को नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब शुरुआती जांच में उन्हें बचाने की कोशिश की गई हो।
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ट्रायल में तय होगा दोष: आरोपियों का यह दावा कि वे घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे (Alibi), अब ट्रायल कोर्ट में साबित करना होगा, इसे याचिका के स्तर पर आधार नहीं बनाया जा सकता।
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जुलाई 2025 का संदर्भ: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2025 के उस आदेश का भी हवाला दिया जिसमें इन मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने को कहा गया था।
सरकार का बड़ा कबूलनामा
मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल ने एक चौंकाने वाला तथ्य रखा। सरकार ने स्वीकार किया कि 1984 के बाद उस समय की जांच एजेंसियों ने “जल्दबाजी में क्लोजर रिपोर्ट” दाखिल की थी ताकि रसूखदार आरोपियों को बचाया जा सके। यही कारण है कि दशकों बाद SIT को नए सिरे से जांच की कमान संभालनी पड़ी।
क्या था कानपुर का वो काला अध्याय?
31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कानपुर में भड़की हिंसा में आधिकारिक तौर पर 127 लोग मारे गए थे, हालांकि अनौपचारिक आंकड़े इससे कहीं अधिक हैं। कई दशकों तक ये मामले ठंडे बस्ते में रहे, लेकिन 2019 में SIT के गठन के बाद से अब तक दर्जनों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं।
भविष्य का रुख:
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब कानपुर की निचली अदालतों (CJM कोर्ट) में ट्रायल की प्रक्रिया तेज होगी। यह फैसला उन सैकड़ों परिवारों के लिए न्याय की अंतिम उम्मीद है जिन्होंने अपनों को खोया और 40 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
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