मुंबई. हर साल फरवरी के करीब आते ही टीवी और अखबारों में ‘राजकोषीय घाटा’, ‘कैपेक्स’ और ‘विनिवेश’ जैसे शब्दों की बाढ़ आ जाती है। एक आम आदमी के लिए ये शब्द किसी अबूझ पहेली जैसे लगते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन शब्दों के पीछे ही आपकी सैलरी, महंगाई और देश के विकास का गणित छिपा होता है।
आइए, बजट 2026 के आने से पहले इन कठिन शब्दों को अपनी बोलचाल की भाषा में समझते हैं।
1. राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): सरकार की ‘उधारी’ का लेखा-जोखा
अक्सर लोग इसे देश का ‘नुकसान’ समझते हैं, लेकिन यह वास्तव में सरकार द्वारा लिया जाने वाला कर्ज है।
-
सरल उदाहरण: मान लीजिए आपकी मासिक आय ₹50,000 है, लेकिन घर की मरम्मत और बच्चों की पढ़ाई के कारण आपका खर्च ₹60,000 हो गया। अब जो ₹10,000 आप बैंक या किसी मित्र से उधार लेंगे, वही आपका ‘राजकोषीय घाटा’ है।
-
महत्व: सरकार यह घाटा पुल, सड़कें और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए लेती है। हालांकि, यदि यह $GDP$ (देश की कुल आय) के 3-4% से अधिक हो जाए, तो इसे अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक माना जाता है क्योंकि इससे महंगाई बढ़ सकती है।
2. कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure / Capex): कल की तैयारी
इसे बजट का ‘पॉजिटिव’ हिस्सा माना जाता है। यह वह पैसा है जो सरकार ‘सम्पत्ति’ बनाने में खर्च करती है।
-
क्या है यह? जब सरकार नए हाईवे, रेलवे ट्रैक, अस्पताल या स्कूल बनाने में पैसा लगाती है, तो उसे ‘कैपेक्स’ कहते हैं।
-
आम आदमी को फायदा: सरकार जितना ज्यादा ‘कैपेक्स’ बढ़ाती है, उतने ही ज्यादा सीमेंट, सरिया और लेबर की जरूरत पड़ती है। इससे बाजार में पैसा आता है और नए रोजगार (Jobs) पैदा होते हैं।
3. राजस्व व्यय (Revenue Expenditure): घर चलाने का खर्च
कैपेक्स जहां सम्पत्ति बनाता है, वहीं राजस्व व्यय सरकार के रोजमर्रा के कामकाज को चलाने के लिए होता है।
-
उदाहरण: सरकारी कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन, कर्ज पर दिया जाने वाला ब्याज और सब्सिडी (जैसे खाद या गैस पर छूट) इसी श्रेणी में आते हैं।
-
चुनौती: सरकार कोशिश करती है कि यह खर्च कम रहे, ताकि ज्यादा से ज्यादा पैसा विकास (कैपेक्स) में लगाया जा सके।
4. विनिवेश (Disinvestment): सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री
जब सरकार अपनी किसी कंपनी (जैसे LIC, एयर इंडिया या किसी सरकारी बैंक) का कुछ हिस्सा प्राइवेट सेक्टर को बेचती है, तो उसे ‘विनिवेश’ कहा जाता है। इससे मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल सरकार विकास योजनाओं में करती है।
💡 क्यों जरूरी है इन शब्दों को समझना?
| शब्द | यदि यह बढ़ता है तो क्या होगा? |
| राजकोषीय घाटा | सरकार पर कर्ज बढ़ेगा, ब्याज दरें और महंगाई बढ़ सकती है। |
| कैपिटल एक्सपेंडिचर | देश में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधरेगा और युवाओं को नौकरियां मिलेंगी। |
| प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) | आपकी इन हैंड सैलरी कम या ज्यादा हो सकती है (इनकम टैक्स)। |
बजट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह सरकार की नियत और दिशा का आईना है। अगर इस बार बजट में ‘कैपेक्स’ पर जोर दिया जाता है, तो समझ लीजिए कि देश में निर्माण कार्य बढ़ेंगे। वहीं, अगर ‘राजकोषीय घाटा’ नियंत्रण में रहता है, तो मान लीजिए कि सरकार भविष्य की चुनौतियों के प्रति सतर्क है।
मातृभूमि समाचार की अपील: बजट के दिन (1 फरवरी) हमारे साथ जुड़ें, जहाँ हम आपको बताएंगे कि आपके घर का बजट इस सरकारी बजट से कैसे प्रभावित होने वाला है।
Matribhumisamachar


