वॉशिंगटन. वैश्विक खनिज राजनीति (Mineral Politics) में एक बड़ा उलटफेर करते हुए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित रेको डिक (Reko Diq) तांबा-सोना परियोजना में $1.3 बिलियन के निवेश की आधिकारिक प्रतिबद्धता जताई है। यह निवेश अमेरिकी Export-Import (EXIM) Bank के माध्यम से किया जाएगा, जो दक्षिण एशिया में अमेरिका के बढ़ते आर्थिक पदचिह्न और चीन पर खनिज निर्भरता कम करने की रणनीति का हिस्सा है।
दुनिया का ‘खजाना’ है रेको डिक
बलूचिस्तान के चगई जिले में स्थित यह खान दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तांबे और सोने के भंडारों में से एक मानी जाती है। अनुमान के मुताबिक, यहाँ 5.9 अरब टन अयस्क मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस परियोजना का पूर्ण दोहन होता है, तो यह पाकिस्तान की जीडीपी में सालाना अरबों डॉलर का योगदान दे सकती है।
हिस्सेदारी का नया समीकरण
कनाडा की दिग्गज खनन कंपनी बैरिक गोल्ड (Barrick Gold) इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रही है। वर्तमान संरचना के अनुसार:
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50% हिस्सेदारी: बैरिक गोल्ड (Barrick Gold)
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25% हिस्सेदारी: पाकिस्तान की संघीय सरकार (SOEs के माध्यम से)
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25% हिस्सेदारी: बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार
अमेरिका के निवेश के पीछे के 3 मुख्य कारण
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चीन को पछाड़ना: वर्तमान में वैश्विक स्तर पर ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ की प्रोसेसिंग पर चीन का नियंत्रण है। अमेरिका इस निवेश के जरिए अपनी खुद की सप्लाई चेन सुरक्षित करना चाहता है।
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ग्रीन एनर्जी की मांग: इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और सौर ऊर्जा उपकरणों के लिए तांबा अनिवार्य है। रेको डिक अगले 40-50 वर्षों तक तांबे की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है।
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रणनीतिक उपस्थिति: ईरान और अफगानिस्तान की सीमा के करीब इस निवेश के जरिए अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता है।
“रेको डिक न केवल एक खनन परियोजना है, बल्कि यह पाकिस्तान के लिए आर्थिक स्थिरता और वैश्विक निवेशकों के लिए एक सुरक्षित गंतव्य साबित होने की दिशा में एक लिटमस टेस्ट है।” — आर्थिक विश्लेषक
बड़ी चुनौतियाँ: सुरक्षा और स्थिरता
इस विशाल निवेश के बावजूद राह आसान नहीं है। बलूचिस्तान में सक्रिय अलगाववादी समूह विदेशी निवेश का विरोध करते रहे हैं। हाल के वर्षों में चीनी इंजीनियरों और परियोजनाओं पर हुए हमलों ने सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। अमेरिका और बैरिक गोल्ड के लिए इस अशांत क्षेत्र में सुचारू संचालन सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
अगला कदम: परियोजना का लक्ष्य 2028 तक उत्पादन शुरू करना है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या पाकिस्तान इस अंतरराष्ट्रीय निवेश को सुरक्षा प्रदान कर पाएगा।
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