लखनऊ | ब्यूरो, अपडेट, 27 मार्च, 2026
उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन ISIS के नेटवर्क को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। सहारनपुर के रहने वाले और मुरादाबाद के एक मेडिकल कॉलेज से डेंटल की पढ़ाई कर रहे हारिस अली ने पूछताछ में अपने पूरे मॉड्यूल का कच्चा चिट्ठा खोल दिया है।
ATS की रिमांड के दौरान हारिस ने अपने 10 प्रमुख सहयोगियों के नाम उजागर किए हैं, जो देशभर में आतंकी नेटवर्क खड़ा करने और टेरर फंडिंग (Terror Funding) में उसकी मदद कर रहे थे।
1. मेडिकल छात्र से ‘डिजिटल रिक्रूटर’ तक का सफर
जांच में सामने आया है कि हारिस अली सिर्फ एक सदस्य नहीं, बल्कि एक शातिर डिजिटल रिक्रूटर के रूप में काम कर रहा था। वह सोशल मीडिया के विभिन्न एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवाओं का ब्रेनवॉश करता था।
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50 से अधिक युवाओं का ग्रुप: हारिस ने इंटरनेट मीडिया पर कई गुप्त ग्रुप बना रखे थे, जिनमें 50 से अधिक युवक जुड़े थे।
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टारगेट स्टेट्स: उसे उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में 50-50 युवाओं की ‘स्लीपर सेल’ (Sleeper Cell) तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया था।
2. लैपटॉप से मिले ‘खतरनाक’ डिजिटल सबूत
ATS ने हारिस के लैपटॉप और मोबाइल को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा था, जिससे चौंकाने वाली जानकारियां मिली हैं:
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संवेदनशील तस्वीरें: लैपटॉप में कुछ महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों और भीड़भाड़ वाले स्थानों की तस्वीरें मिली हैं, जिन्हें कथित तौर पर ISIS के विदेशी हैंडलर्स को भेजा गया था।
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ईमेल ट्रेल: कई ऐसे ईमेल्स का पता चला है जिनमें कट्टरपंथी साहित्य और हमले की साजिश से जुड़े कोडवर्ड्स का इस्तेमाल किया गया है।
3. 10 सहयोगियों की तलाश में देशभर में छापेमारी
हारिस द्वारा दी गई जानकारी के बाद ATS ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है:
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UP से 4 साथी: उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से 4 संदिग्धों की पहचान हुई है।
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6 अन्य राज्यों से: दिल्ली, बिहार और पंजाब समेत अन्य राज्यों से जुड़े 6 सहयोगियों की गिरफ्तारी के लिए स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर छापेमारी की जा रही है।
4. विचारधारा के नाम पर युवाओं का शिकार
पूछताछ में हारिस ने एक डराने वाली बात कुबूली है। उसने बताया कि वह पैसों के लालच में नहीं, बल्कि संगठन की विचारधारा से प्रभावित होकर इस दलदल में उतरा था। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह और भी खतरनाक है क्योंकि विचारधारा से प्रेरित होकर काम करने वाले संदिग्धों को ट्रैक करना और सामान्य करना काफी कठिन होता है।
निष्कर्ष और चेतावनी: > यह मामला सोशल मीडिया की डार्क साइड को उजागर करता है। युवाओं को ऑनलाइन कट्टरपंथ से बचाने के लिए अब सुरक्षा एजेंसियां शिक्षण संस्थानों और सोशल मीडिया मॉनिटरिंग को और सख्त करने जा रही हैं।
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