प्रयागराज । शनिवार, 27 जून 2026
उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में हो रही देरी को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने राज्य सरकार के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। न्यायालय ने चुनाव टालने की मंशा से जारी किए गए उत्तर प्रदेश सरकार के हालिया आदेशों को पूरी तरह से असंवैधानिक और शून्य (गैर-मौजूद) घोषित कर दिया है। इस फैसले के बाद प्रदेश की सियासत और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ का ऐतिहासिक फैसला
अरविंद राठौर द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायधीश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 25 मई 2026 और 26 मई 2026 को जारी किए गए शासनादेशों को खारिज कर दिया। सरकार ने इन आदेशों के जरिए आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को स्थगित करने का प्रयास किया था।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने ये विवादित आदेश उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12 (3-ए) के तहत पारित किए थे। कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया कि इस विशिष्ट कानूनी प्रावधान को हाईकोर्ट की एक खंडपीठ (Division Bench) पहले ही ‘प्रमोद लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ के ऐतिहासिक मामले में पूरी तरह असंवैधानिक (Unconstitutional) घोषित कर चुकी है। ऐसे में एक पूर्व-घोषित असंवैधानिक प्रावधान के सहारे दोबारा चुनाव टालना कानूनन पूरी तरह गलत है।
संविधान का हवाला: 5 साल से अधिक नहीं टल सकते चुनाव
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे का हवाला दिया। पीठ ने रेखांकित किया कि:
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अनुच्छेद 243-ई (Article 243E): के तहत देश में पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष के लिए पूरी तरह निश्चित और सीमित किया गया है।
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अनुच्छेद 243-के (Article 243K): राज्य निर्वाचन आयोग को समय पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की पूर्ण शक्ति और जिम्मेदारी देता है।
न्यायालय की टिप्पणी: “संविधान की मंशा साफ है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का कार्यकाल खत्म होने से पहले या ठीक समय पर चुनाव हो जाने चाहिए। किसी भी परिस्थिति में असंवैधानिक नियमों का सहारा लेकर लोकतंत्र के सबसे निचले और महत्वपूर्ण स्तर (Panchayats) को प्रशासनिक शून्यता में नहीं धकेला जा सकता।”
OBC आयोग की रिपोर्ट और लॉजिस्टिक्स पर तल्ख टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने दलील दी कि राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग की रिपोर्ट आना अभी लंबित है, जिसके कारण सीटों के आरक्षण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है और चुनाव टालने पड़े।
इस पर हाईकोर्ट ने गहरी हैरानी और नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के स्पष्ट और कड़े दिशा-निर्देशों के बावजूद ओबीसी आयोग ने अब तक अपनी अंतिम रिपोर्ट राज्य सरकार को क्यों नहीं सौंपी?
दूसरी ओर, राज्य चुनाव आयोग (State Election Commission) ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए बड़ा खुलासा किया। आयोग ने बताया कि चुनाव कराने की प्रारंभिक तैयारी के तहत 10 जून 2026 को ही अंतिम मतदाता सूची (Voter List) प्रकाशित की जा चुकी है। निर्वाचन आयोग चुनाव कराने के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह तैयार है, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आवश्यक लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा बल और वित्तीय संसाधन (Resources) मुहैया न कराए जाने के कारण चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
प्रधान नहीं संभालेंगे प्रशासक का पद: प्रशासनिक मनमानी पर रोक
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस व्यवस्था को भी सिरे से खारिज कर दिया, जिसके तहत कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी पुराने ग्राम प्रधानों को ही ‘प्रशासक’ (Administrators) के रूप में काम जारी रखने की अनुमति दी जा रही थी। कोर्ट ने साफ किया कि कार्यकाल खत्म होने के बाद जनप्रतिनिधियों को पिछले दरवाजे से प्रशासनिक शक्तियां देना नियमों के खिलाफ है।
13 जुलाई 2026 को अगली सुनवाई: अवमानना की तलवार
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश शासन को अंतिम अवसर (Last Opportunity) देते हुए एक विस्तृत हलफनामा (Detailed Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में सरकार को दो प्रमुख बातें स्पष्ट करनी होंगी:
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ओबीसी आयोग की रिपोर्ट कब तक जमा होगी और आरक्षण की स्थिति क्या है?
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राज्य में पंचायत चुनाव संपन्न कराने की एकदम सटीक और निश्चित समय-सीमा (Timeline) क्या है?
व्यक्तिगत पेशी की चेतावनी: यदि उत्तर प्रदेश सरकार 13 जुलाई तक संतोषजनक हलफनामा दाखिल करने में विफल रहती है, तो 25 मई 2026 का विवादित शासनादेश जारी करने वाले अधिकारी (संबंधित प्रतिवादी संख्या दो – अपर मुख्य सचिव/सचिव पंचायती राज) को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। वे अदालत को स्पष्टीकरण देंगे कि जानते हुए भी असंवैधानिक प्रावधानों के तहत आदेश क्यों जारी किए गए। ऐसा न करने की स्थिति में इसे कोर्ट प्रथम दृष्टया न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) मानेगा और दंडात्मक कार्रवाई शुरू की जाएगी।
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