मुंबई. अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) ने 28 जनवरी 2026 को हुई अपनी मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों को 3.50% से 3.75% के दायरे में स्थिर रखने का फैसला किया है। यह फैसला पिछले वर्ष लगातार तीन बार की गई दर कटौती के बाद लिया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि फेड फिलहाल आर्थिक आंकड़ों की स्थिरता और महंगाई नियंत्रण पर फोकस बनाए हुए है।
फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल के बयान के अनुसार अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती बनी हुई है, रोजगार बाजार स्थिर है और महंगाई दबाव अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसी कारण फेड ने “वेट एंड वॉच” (Wait & Watch) रणनीति अपनाते हुए ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया।
📊 भारतीय शेयर बाजार पर मुख्य प्रभाव
1️⃣ बाजार में स्थिरता और मिश्रित प्रतिक्रिया
फेड का फैसला पहले से बाजार अनुमानों के अनुरूप रहा, इसलिए सेंसेक्स और निफ्टी में न तो तेज उछाल देखने को मिला और न ही बड़ी गिरावट। शुरुआती कारोबार में बाजार सतर्क और सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव करता नजर आया।
हालांकि, फेड द्वारा महंगाई और वैश्विक टैरिफ जोखिमों को लेकर जताई गई चिंता भविष्य के लिए अनिश्चितता पैदा कर रही है।
2️⃣ FII (विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक) का रुख
- अमेरिकी दरें स्थिर रहने से डॉलर की मजबूती बनी रह सकती है।
- इससे उभरते बाजारों, विशेषकर भारत जैसे देशों से पूंजी निकासी का दबाव बढ़ सकता है।
- पिछले कुछ महीनों से भारतीय शेयर बाजार में FII की निरंतर बिकवाली का ट्रेंड बना हुआ है और फेड के इस अपेक्षाकृत हॉकिश रुख से इसमें कमी की संभावना फिलहाल कम दिखती है।
3️⃣ रुपये की विनिमय दर पर असर
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में मजबूती और डॉलर की स्थिरता के कारण भारतीय रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
यदि डॉलर मजबूत होता है, तो रुपये में मध्यम गिरावट देखने को मिल सकती है, जिससे आयात महंगा और महंगाई पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ सकता है।
4️⃣ सेक्टर-विशिष्ट प्रभाव
🖥️ IT सेक्टर
भारतीय आईटी कंपनियों की निर्भरता अमेरिकी बाजार पर अधिक है।
- ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कम होने से
- अमेरिकी मांग में सुस्ती का खतरा
👉 आईटी शेयरों पर दबाव बना रह सकता है
🏦 बैंकिंग और NBFC सेक्टर
- वैश्विक तरलता (Liquidity) में कमी
- विदेशी निवेश में गिरावट
👉 बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों में अस्थिरता की संभावना
🧠 आर्थिक विश्लेषण
फेड का यह फैसला साफ संकेत देता है कि अमेरिका फिलहाल आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की नीति पर चल रहा है।
दर कटौती की बजाय डेटा-आधारित रणनीति अपनाई जा रही है, जिससे वैश्विक बाजारों में:
- निवेशक सतर्क रहेंगे
- जोखिम वाली संपत्तियों (Equities) में सीमित निवेश
- सुरक्षित निवेश विकल्पों (Dollar, Bonds) की ओर झुकाव
देखने को मिल सकता है।
📌 मुख्य बिंदु (Quick Summary)
| विवरण | स्थिति |
|---|---|
| वर्तमान फेड दर | 3.50% – 3.75% |
| फैसले का आधार | मजबूत आर्थिक वृद्धि + ऊँची महंगाई |
| भारतीय बाजार का रुख | सतर्क, मिश्रित प्रतिक्रिया |
| FII गतिविधि | बिकवाली का दबाव |
| रुपये पर असर | दबाव की संभावना |
| प्रभावित सेक्टर | IT, बैंकिंग, NBFC |
अमेरिकी फेड का ब्याज दरों को स्थिर रखने का फैसला वैश्विक बाजारों के लिए संकेतात्मक स्थिरता जरूर देता है, लेकिन भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए यह स्थिति पूंजी प्रवाह, रुपये की मजबूती और निवेश धारणा पर दबाव बना सकती है।
आने वाले दिनों में भारतीय बाजारों की दिशा काफी हद तक:
- अमेरिकी आर्थिक डेटा
- वैश्विक महंगाई संकेत
-
विदेशी निवेश प्रवाह
पर निर्भर करेगी।
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