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त्र्यंबकेश्वर मंदिर में चमत्कार! 65 फीट गहरे ‘अमृतकुंड’ की सफाई के दौरान प्रकट हुआ प्राचीन शिवलिंग, बरसों बाद हुआ दुर्लभ दर्शन

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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नासिक । मंगलवार, 30 जून 2026

महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, प्रसिद्ध श्री त्र्यंबकेश्वर महादेव मंदिर से एक बेहद अद्भुत और आस्था को गहराई से झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। मंदिर परिसर में स्थित ऐतिहासिक और पवित्र ‘अमृतकुंड’ के रखरखाव और सफाई के दौरान उसके तल में एक प्राचीन शिवलिंग दिखाई दिया है। यह दुर्लभ और अलौकिक दृश्य कई दशकों के बाद देखने को मिला है, जिससे स्थानीय प्रशासन, मंदिर ट्रस्ट और शिव भक्तों के बीच भारी उत्साह और कौतूहल का माहौल है।

?️ ASI के संरक्षण कार्य के दौरान हुआ यह बड़ा खुलासा

यह ऐतिहासिक रहस्य तब उजागर हुआ जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम मंदिर परिसर में नियमित संरक्षण, संवर्द्धन और साफ-सफाई का कार्य कर रही थी। इस प्रक्रिया के तहत अमृतकुंड की मरम्मत के लिए इसके पूरे पानी को मोटरों के जरिए बाहर निकाला गया। जैसे ही 65 फीट गहरे इस कुंड का तल पूरी तरह खाली हुआ, वहाँ सदियों से जलमग्न एक छोटा और प्राचीन शिवलिंग स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।

सामान्य दिनों में इस कुंड में पानी का स्तर हमेशा लबालब भरा रहता है, जिसके कारण पानी के भीतर स्थित इस शिवलिंग के दर्शन कर पाना असंभव होता है। एएसआई के अधिकारियों और मंदिर के पुजारियों की मौजूदगी में यह दुर्लभ नजारा कैमरे में भी कैद हुआ, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

? क्यों बेहद खास है 65 फीट गहरा अमृतकुंड?

मंदिर परिसर में बना यह अमृतकुंड लगभग 60 से 65 फीट गहरा है। इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व अत्यधिक है क्योंकि इसी कुंड के पवित्र और शुद्ध जल का उपयोग सदियों से मुख्य त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दैनिक अभिषेक, श्रृंगार और सरकारी महापूजा के लिए किया जाता रहा है।

फैक्ट चेक व सुधार (Correction Note): धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मगिरि से निकलने वाली गोदावरी नदी का ही एक गुप्त स्रोत इस कुंड से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस ऐतिहासिक धरोहर को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे और इसकी पवित्रता बनी रहे, इसके लिए आम श्रद्धालुओं के इस कुंड के भीतर जाने या उतरने पर पूरी तरह से प्रतिबंध (Banned) लगाया गया है।

?️ त्र्यंबकेश्वर मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व

त्र्यंबकेश्वर महादेव मंदिर सिर्फ आस्था का ही नहीं, बल्कि वास्तुकला और इतिहास का भी एक अनूठा केंद्र है। यहाँ स्थित शिवलिंग को ‘त्रिमुखी’ कहा जाता है, जिसमें तीन छोटे-छोटे लिंग हैं। ये तीनों लिंग त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) का प्रतीक माने जाते हैं, जो इसे दुनिया का एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग बनाते हैं।

इस पावन परिसर का निर्माण और विकास इतिहास के इन पन्नों में दर्ज है:

ऐतिहासिक स्थलनिर्माणकर्ता / संरक्षकनिर्माण काल / विशेषता
मुख्य त्र्यंबकेश्वर मंदिरश्रीमंत नानासाहेब पेशवावर्ष 1755 से 1786 के बीच काले पत्थरों से भव्य निर्माण कराया गया।
कुशावर्त कुंडश्रीमंत सरदार रावसाहेब पार्नेकरइंदौर के फड़नवीस रावसाहेब पार्नेकर द्वारा इस पवित्र स्नान कुंड का पक्का निर्माण कराया गया था।
ब्रह्मगिरि पर्वतप्राकृतिक / आध्यात्मिकमंदिर के ठीक पीछे स्थित पर्वत, जिसे दक्षिण भारत की गंगा यानी गोदावरी नदी का उद्गम स्थल माना जाता है।

? सुरक्षा के कड़े प्रबंध, आम लोगों के जाने पर रोक

अमृतकुंड के तल में शिवलिंग दिखने की खबर फैलते ही नासिक और आस-पास के इलाकों से हजारों श्रद्धालु मंदिर की तरफ दौड़ पड़े हैं। हालांकि, मंदिर प्रशासन और स्थानीय पुलिस ने सुरक्षा कारणों और एएसआई (ASI) के चल रहे काम में बाधा न आए, इसलिए अमृतकुंड वाले हिस्से को पूरी तरह से सील कर दिया है। केवल एएसआई के प्राधिकृत कर्मचारियों और अनुष्ठान करने वाले चुनिंदा पुजारियों को ही उस क्षेत्र में जाने की अनुमति है।

पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि पानी के भीतर होने के कारण यह शिवलिंग सदियों से सुरक्षित रहा है और जल का निरंतर प्रभाव इस पर बना हुआ था। इस दुर्लभ खोज ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारत के प्राचीन मंदिरों के गर्भ में आज भी न जाने कितने ऐतिहासिक रहस्य और चमत्कार दबे हुए हैं।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।