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इलाहाबाद हाई कोर्ट से इरफान सोलंकी को बड़ा झटका, आगजनी मामले में 7 साल की सजा पर रोक से इनकार

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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प्रयागराज हाई कोर्ट परिसर का दृश्य

लखनऊ. समाजवादी पार्टी (सपा) के पूर्व विधायक इरफान सोलंकी को आगजनी मामले में एक बार फिर बड़ा कानूनी झटका लगा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा पर रोक लगाने की मांग की थी।

अदालत का स्पष्ट रुख

हाई कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति सुरेंद्र सिंह शामिल थे, ने साफ शब्दों में कहा कि गंभीर आपराधिक मामलों में सजा पर रोक तभी लगाई जा सकती है, जब इसके लिए ठोस और असाधारण आधार मौजूद हों। इस मामले में अदालत को ऐसा कोई कारण नहीं दिखा, जिसके आधार पर सजा पर रोक लगाई जाए।

विधानसभा सदस्यता पर सीधा असर

सजा पर रोक न मिलने का सीधा परिणाम यह हुआ कि इरफान सोलंकी की विधानसभा सदस्यता की अयोग्यता बरकरार रहेगी। वह फिलहाल जेल में ही रहेंगे और उनकी राजनीतिक वापसी पर भी फिलहाल विराम लग गया है। गौरतलब है कि वह कानपुर की सीसामऊ विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं।

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क्या है पूरा मामला?

इरफान सोलंकी को कानपुर की विशेष एमपी/एमएलए अदालत ने जाजमऊ क्षेत्र में एक महिला के घर में आगजनी के मामले में दोषी ठहराया था। अदालत ने इस मामले को गंभीर अपराध की श्रेणी में मानते हुए उन्हें सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

भाई रिजवान सोलंकी को भी राहत नहीं

इस मामले में इरफान सोलंकी के भाई रिजवान सोलंकी की याचिका पर भी हाई कोर्ट का रुख सख्त रहा। अदालत ने संकेत दिए कि कानून के सामने राजनीतिक पहचान या पारिवारिक संबंध कोई ढाल नहीं बन सकते

राजनीतिक हलकों में बढ़ी हलचल

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद कानपुर की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। विपक्ष जहां इसे कानून के राज की जीत बता रहा है, वहीं सपा खेमे में इस फैसले को लेकर अंदरूनी मंथन शुरू हो गया है। आने वाले दिनों में यह मामला कानपुर की सियासत और उपचुनाव की संभावनाओं को भी प्रभावित कर सकता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला साफ संदेश देता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में न्यायपालिका किसी भी तरह की नरमी के पक्ष में नहीं है। इरफान सोलंकी के मामले में सजा पर रोक से इनकार न केवल एक कानूनी निर्णय है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए भी एक अहम संकेत माना जा रहा है।

 

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।