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संभल शाही इमाम सरकारी जमीन विवाद: वक्फ के दावे और 7 करोड़ के जुर्माने के बीच लेखपाल ने दर्ज कराई FIR

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संभल । रविवार, 31 मई 2026

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में भू-माफियाओं और सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे के खिलाफ चल रहे प्रशासनिक अभियान के तहत एक बहुत बड़ा कानूनी मोड़ आया है। संभल की ऐतिहासिक जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना आफताब हुसैन वारसी और उनके भाई मेहताब हुसैन की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। ताजा घटनाक्रम में, संभल कोतवाली क्षेत्र के सैफखां सराय गांव में स्थित मजार, मस्जिद और उनके निवास स्थान को लेकर हल्का लेखपाल ने दोनों भाइयों के खिलाफ धोखाधड़ी और अवैध कब्जे का मुकदमा (FIR) दर्ज करा दिया है।

प्रशासन और शाही इमाम के दावों के बीच चल रही इस कानूनी जंग में कई ऐसे तकनीकी पहलू हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है। आइए इस पूरे मामले की कड़ियों और नवीनतम जानकारियों पर एक नजर डालते हैं।

क्या है सैफखां सराय जमीन विवाद का पूरा मामला?

यह पूरा विवाद संभल-चन्दौसी मुख्यमार्ग से सटी हुई बेहद बेशकीमती जमीन से जुड़ा है। राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, गाटा संख्या 452 (क्षेत्रफल लगभग 0.1340 हेक्टेयर या करीब 2 बीघा) की यह जमीन मूल रूप से ‘ग्राम समाज’ की है। 1970 के दशक में चकबंदी प्रक्रिया के दौरान इस जमीन को सार्वजनिक उपयोग, विशेषकर ‘वृक्षारोपण (पेड़ लगाने)’ के लिए आरक्षित किया गया था।

प्रशासन का आरोप है कि शाही इमाम आफताब हुसैन वारसी और उनके भाई मेहताब हुसैन ने इस सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से एक स्थायी मकान, एक मस्जिद और अपने पिता की मजार (दरगाह) का निर्माण कर लिया।

खतौनी और 2003 का पुराना आदेश

राजस्व विभाग की जांच में सामने आया कि 1410-1415 फसली वर्ष के दौरान आरोपियों का नाम खतौनी में ‘श्रेणी चार’ (अस्थायी या बिना अधिकार के कब्जे वाले रूप में) दर्ज हो गया था। हालांकि, मामले की गंभीरता को देखते हुए 27 जनवरी 2003 को तत्कालीन तहसीलदार संभल ने उनके नाम को खारिज कर दिया था और जमीन को पुनः पूरी तरह ग्राम समाज के खाते में दर्ज कर दिया था। इसके बावजूद जमीन पर भौतिक कब्जा बना रहा।

वक्फ बोर्ड में गलत पंजीकरण का गंभीर आरोप

लेखपाल मुकेश कुमार यादव द्वारा पुलिस को दी गई तहरीर में एक बहुत बड़ा खुलासा किया गया है। आरोप है कि जब वर्ष 2003 में राजस्व अदालत से नाम खारिज हो गया, तब आरोपियों ने जमीन पर अपना कब्जा कानूनी रूप से सही दिखाने के लिए उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड का सहारा लिया।

  • तथ्य छुपाने का आरोप: आरोपियों ने वक्फ बोर्ड में पंजीकरण के लिए आवेदन करते समय यह छुपाया कि यह एक सार्वजनिक और ग्राम समाज की आरक्षित भूमि है।

  • केवल चौहद्दी का खेल: उन्होंने चालाकी से केवल गाटे की चौहद्दी (Boundaries/चतुर्सीमा) लिखकर इसे वक्फ संपत्ति (वक्फ नंबर 3037) के रूप में पंजीकृत करा लिया, जिसके आधार पर वे इसे अपनी पुश्तैनी और धार्मिक संपत्ति बताते रहे।

तहसीलदार कोर्ट का कड़ा एक्शन: 7 करोड़ का भारी-भरकम जुर्माना

इस मामले में छह महीने पहले राजस्व नियमावली की धारा 67 के तहत जांच शुरू हुई थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और राजस्व दस्तावेजों की गहन पड़ताल के बाद तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह की कोर्ट ने इस जमीन को अवैध कब्जा घोषित किया

चूंकि यह जमीन मुख्य मार्ग पर स्थित है और इसकी बाजार दर बहुत अधिक (करीब 5 करोड़ रुपये) है, इसलिए अदालत ने जमीन की सर्किल रेट के आधार पर शाही इमाम और उनके भाई पर 6.94 करोड़ रुपये (लगभग 7 करोड़ रुपये) का भारी जुर्माना लगाया है। साथ ही 30 दिनों के भीतर कब्जा हटाने और जुर्माना न भरने पर कुर्की व बुलडोजर एक्शन की चेतावनी दी गई है।

वर्तमान कानूनी स्थिति: क्या है शाही इमाम का पक्ष?

शाही इमाम आफताब हुसैन का कहना है कि यह उनकी पुश्तैनी जमीन है और यह निर्माण काफी पुराना है। उन्होंने इस कार्रवाई को एकतरफा बताते हुए उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) का भी दरवाजा खटखटाया था। फिलहाल, तहसीलदार कोर्ट के जुर्माने के आदेश के खिलाफ शाही इमाम ने जिला मजिस्ट्रेट (DM) कोर्ट में अपील की है। डीएम कोर्ट में दोनों पक्षों की बहस पूरी हो चुकी है और अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जो कभी भी आ सकता है।

निष्कर्ष

संभल में हाल के महीनों में तालाबों, कब्रिस्तानों और ग्राम समाज की जमीनों पर बने करीब 17 अवैध धार्मिक ढांचों को हटाया गया है। ऐसे में शाही इमाम पर दर्ज हुई यह एफआईआर इस बात का संकेत है कि प्रशासन अब इस मामले में कानूनी रूप से आर-पार के मूड में है। अब सभी की निगाहें डीएम कोर्ट के आने वाले फैसले पर टिकी हैं।

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